अपर सिलेरू परियोजना का विरोध, आदिवासी JAC ने मंजूरी रद्द करने की मांग की

Update: 2026-07-26 09:34 GMT

आंध्र प्रदेश : आदिवासी संयुक्त कार्रवाई समिति (जेएसी) ने अल्लूरी सितारामा राजू (एएसआर) जिले में प्रस्तावित अपर सिलेरू पंप स्टोरेज हाइड्रोपावर परियोजना को लेकर विरोध जताया है। समिति ने परियोजना के लिए दी गई वन भूमि डायवर्जन मंजूरी को तत्काल रद्द करने की मांग की है।

आंध्र प्रदेश आदिवासी जेएसी के जिला अध्यक्ष रामाराव डोरा ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए सरकार से जी.ओ. नंबर 29 को वापस लेने की मांग की। इस आदेश के तहत चिंतापल्ली डिवीजन के गुडेम कोठा विधि मंडल क्षेत्र में अपर सिलेरू गांव के पास 128.61 हेक्टेयर वन भूमि को परियोजना के लिए डायवर्ट करने की अनुमति दी गई है।

जेएसी का कहना है कि यह क्षेत्र आदिवासी समुदायों के जीवन, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से गहराई से जुड़ा हुआ है। समिति ने आशंका जताई है कि परियोजना के कारण स्थानीय लोगों के अधिकारों, पर्यावरण और वन क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

रामाराव डोरा ने कहा कि वन भूमि का उपयोग किसी भी विकास परियोजना के लिए करने से पहले स्थानीय आदिवासी समुदायों की चिंताओं और अधिकारों को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना को मंजूरी देते समय स्थानीय लोगों की भावनाओं और संभावित प्रभावों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

अपर सिलेरू पंप स्टोरेज हाइड्रोपावर परियोजना ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी एक महत्वपूर्ण योजना मानी जा रही है। पंप स्टोरेज परियोजनाएं बिजली उत्पादन और ऊर्जा भंडारण की आधुनिक तकनीक पर आधारित होती हैं, जिनका उपयोग बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए किया जाता है।

हालांकि, आदिवासी संगठनों का कहना है कि ऐसे बड़े प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पर्यावरणीय प्रभावों का गहन अध्ययन और स्थानीय समुदायों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। जेएसी ने कहा कि वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों की आजीविका काफी हद तक जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है।

समिति ने सरकार से मांग की है कि परियोजना से जुड़े सभी पहलुओं की दोबारा समीक्षा की जाए और आदिवासी क्षेत्रों में विकास योजनाएं बनाते समय स्थानीय लोगों को विश्वास में लिया जाए। जेएसी नेताओं ने कहा कि वे आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर अपना आंदोलन आगे भी जारी रखेंगे।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि वन भूमि केवल जमीन का एक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह वहां रहने वाले समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का आधार है। इसलिए किसी भी परियोजना के लिए भूमि उपयोग में बदलाव करते समय व्यापक चर्चा और सहमति जरूरी है।

जेएसी ने आरोप लगाया कि वन भूमि डायवर्जन से क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन पर असर पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से अपील की कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।

वहीं, परियोजना समर्थकों का तर्क है कि पंप स्टोरेज हाइड्रोपावर जैसी योजनाएं राज्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इससे बिजली आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने और भविष्य की ऊर्जा मांगों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, इस परियोजना को लेकर आदिवासी संगठनों की आपत्तियों के बाद मामला विवाद का विषय बन गया है। जेएसी अब सरकार से जी.ओ. नंबर 29 को रद्द करने और परियोजना की मंजूरी पर पुनर्विचार करने की मांग कर रही है।

फिलहाल सरकार की ओर से इस मांग पर कोई अंतिम प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन आदिवासी संगठनों की चिंताओं को किस तरह संबोधित करता है और परियोजना को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं।

अपर सिलेरू परियोजना को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और पर्यावरण एवं स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने ला दिया है।

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