भूमि पुनर्सर्वेक्षण त्रुटियाँ: नेल्लोर के किसान स्वामित्व स्थापित करने में असमर्थ
नेल्लोर: SPSR नेल्लोर जिले में सैकड़ों किसान भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। ये परेशानियां पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान अधिकारियों द्वारा किए गए भूमि के पुनर्सर्वेक्षण (री-सर्वे) में हुई गड़बड़ियों के कारण पैदा हुई हैं।
भूमि के वर्गीकरण, सीमाओं और दर्ज क्षेत्रफल में गलतियों की वजह से किसान अपनी उन जमीनों पर मालिकाना हक साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जो पीढ़ियों से उनके परिवारों के पास थीं।
इन गलतियों के कारण जमीन की खरीद-बिक्री, बैंक लोन लेने और अन्य वित्तीय कार्यों में भी रुकावट आ रही है।
यह समस्या कलुवोया मंडल के नुकनापल्ली गांव में सामने आई है, जहां कई भूमि रिकॉर्ड में गड़बड़ियां पाई गई हैं। एक शिकायत में, किसान डेसिरेड्डी नरसिम्हा रेड्डी ने कई प्रविष्टियों (entries) में सुधार की मांग की है। इनमें उनकी पुश्तैनी 0.86 एकड़ जमीन भी शामिल है, जिसे पुनर्सर्वेक्षण में केवल 0.231 एकड़ दर्ज किया गया था। इसके अलावा, पुश्तैनी और खरीदी गई अन्य जमीनों के रिकॉर्ड में भी कथित तौर पर गलतियां की गई हैं।
इन गड़बड़ियों के नतीजे केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं। जमीन की सीमाओं का गलत निर्धारण पड़ोसी किसानों के बीच विवाद पैदा कर सकता है। वहीं, सर्वे नंबर और लैंड पार्सल मेजरमेंट (LPM) नंबरों में अंतर, मालिकाना हक की गलत प्रविष्टियां और पट्टादार पासबुक में गलतियों के कारण संपत्ति के पंजीकरण, फसल ऋण, जमीन गिरवी रखने और 'अन्नदाता सुखीभव' जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में रुकावट आ सकती है।
किसानों ने भूमि के गलत वर्गीकरण, अपनी जमीनों को 'निषिद्ध संपत्ति' (prohibited properties) की सूची में शामिल किए जाने और शिकायतों के समाधान में देरी का भी मुद्दा उठाया है।
कुछ किसानों को लगता है कि ये गंभीर गड़बड़ियां शायद अतीत में राजस्व रिकॉर्ड के साथ जानबूझकर की गई छेड़छाड़ का नतीजा हो सकती हैं।
वे मांग कर रहे हैं कि किसी भी तरह का सुधार करने से पहले, मूल दस्तावेजों की गहन जांच की जाए और जमीन की भौतिक माप (physical measurement) कराई जाए।
किसानों का कहना है कि पुनर्सर्वेक्षण शुरू होने से पहले ही जमीन से जुड़े कई विवाद मौजूद थे। कुछ मामलों में, कृषि पट्टे वाली जमीनों को गलती से सरकारी जमीन या 'टैंक पोराम्बोके' (जलाशय से जुड़ी सरकारी जमीन) के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया है।
रिकॉर्ड किए गए क्षेत्रफल और सर्वे नंबरों में गड़बड़ियों ने संपत्ति की खरीद-बिक्री, विरासत के दावों और संस्थागत ऋण (बैंक लोन) प्राप्त करने की प्रक्रिया को और भी जटिल बना दिया है। इससे जमीन मालिकों के लिए अपनी ही संपत्ति का स्वतंत्र रूप से उपयोग या लेनदेन करना मुश्किल हो गया है।
यह समस्या विदावलुर मंडल के उटुकुरु गांव में साफ तौर पर देखी जा सकती है, जहां किसानों ने 61 सर्वे नंबरों में फैली 201.80 एकड़ जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की मांग की है। जिला कलेक्टर को दिए गए एक ज्ञापन में, उन्होंने आरोप लगाया कि 1936 से 2013 के बीच हुई रजिस्टर्ड बिक्री के बावजूद, गांव के रिकॉर्ड में इन जमीनों को गलत तरीके से 'टैंक पोरामबोके' (जलाशय वाली सरकारी जमीन) के रूप में दर्ज कर दिया गया है।
किसानों ने अपने दावों को साबित करने के लिए सब-रजिस्ट्रार के 'रजिस्टर ऑफ होल्डिंग्स', 'अडंगल' रिकॉर्ड, पट्टादार पासबुक और किसानों को जारी किए गए मालिकाना हक के दस्तावेजों (टाइटल डीड) का हवाला दिया।
उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से कुछ जमीनों पर फसल ऋण (क्रॉप लोन) भी मंजूर किए गए थे, और उनका तर्क है कि संबंधित जमीन पर कोई जलाशय (टैंक) मौजूद ही नहीं है।
उन्होंने इन संपत्तियों को फिर से 'पट्टा भूमि' के रूप में वर्गीकृत करने और अल्लूर स्थित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा रखी जाने वाली 'निषिद्ध संपत्तियों' (प्रोहिबिटेड प्रॉपर्टीज) की सूची से इन्हें हटाने की मांग की है।
प्रभावित किसान अब एक निश्चित समय-सीमा के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। इनमें संयुक्त रूप से फिर से सर्वे (री-सर्वे) करना, सीमाओं का सत्यापन करना, 'रिकॉर्ड ऑफ राइट्स' और पट्टादार पासबुक में सुधार करना, तथा राजस्व और पंजीकरण विभागों के बीच बेहतर तालमेल बिठाना शामिल है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि इन विसंगतियों को दूर करने में देरी होने पर, असली जमीन मालिकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, कानूनी विवादों में फंसना पड़ सकता है, और दशकों से उनके परिवारों के पास मौजूद इन संपत्तियों को लेकर लंबे समय तक अनिश्चितता बनी रह सकती है।