बच्चों के खानपान पर नई रिसर्च, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और ब्रेन रिस्पॉन्स में मिला संबंध
लाइफस्टाइल : बच्चों के खानपान में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की अधिक हिस्सेदारी का संबंध केवल वजन से नहीं, बल्कि भोजन देखकर दिमाग की प्रतिक्रिया से भी हो सकता है। एक नए अध्ययन में पाया गया कि ऐसे खाद्य पदार्थ अधिक खाने वाले बच्चों के मस्तिष्क के एक विशेष हिस्से में आकर्षक खाने की तस्वीरें देखकर ज्यादा गतिविधि दिखाई दी। यह प्रतिक्रिया अगले एक वर्ष में शरीर की चर्बी बढ़ने से भी जुड़ी मिली। हालांकि, अध्ययन यह साबित नहीं करता कि इन खाद्य पदार्थों ने बच्चों के दिमाग को नुकसान पहुंचाया या सीधे मोटापा पैदा किया।
अक्टूबर 2026 में ‘जामा नेटवर्क ओपन’ में प्रकाशित शोध में सात से दस वर्ष के 46 बच्चे शामिल थे। अध्ययन की शुरुआत में सभी का वजन स्वस्थ श्रेणी में था। शोधकर्ताओं ने उनके भोजन, शरीर की बनावट और खाने की तस्वीरों पर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश की। इसका उद्देश्य यह देखना था कि खानपान और बाद में शरीर की चर्बी बढ़ने के बीच दिमाग की कोई भूमिका हो सकती है या नहीं। बच्चों को कुकीज और फ्रेंच फ्राइज जैसे आकर्षक खाद्य पदार्थों की तस्वीरें दिखाई गईं। इस दौरान मस्तिष्क की गतिविधि मापी गई। शुरुआत में भोजन संबंधी जानकारी और शरीर के माप लिए गए तथा लगभग एक वर्ष बाद शरीर की बनावट दोबारा जांची गई। इससे शोधकर्ताओं को शुरुआती दिमागी प्रतिक्रिया और बाद में हुए शारीरिक बदलावों का संबंध देखने का अवसर मिला।
अधिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन लेने वाले बच्चों में ‘डॉर्सल स्ट्रायटम’ नामक हिस्से की प्रतिक्रिया मजबूत थी। यह हिस्सा पुरस्कार की अनुभूति, प्रेरणा और आदत बनने जैसी प्रक्रियाओं से संबंधित है। अध्ययन में इसकी अधिक गतिविधि का संबंध बाद में बॉडी मास इंडेक्स और शरीर की चर्बी में बढ़ोतरी से मिला। शोधकर्ताओं के लिए यह खानपान और वजन के संबंध को समझने का एक संभावित रास्ता है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड एक शोध श्रेणी है, जिसे बोलचाल के ‘जंक फूड’ का बिल्कुल समानार्थी नहीं समझना चाहिए। इसमें औद्योगिक रूप से तैयार कई तरह के उत्पाद आ सकते हैं। इसलिए किसी एक परिचित खाद्य पदार्थ का नाम देखकर पूरी श्रेणी के बारे में फैसला करना या सभी पैकेटबंद चीजों को एक जैसा मान लेना इस अध्ययन की सही व्याख्या नहीं होगी।
इस शोध की सीमाएं महत्वपूर्ण हैं। इसमें केवल 46 बच्चे थे और मस्तिष्क की गतिविधि एक ही समय पर मापी गई थी। अध्ययन अवलोकन आधारित था; बच्चों को अलग-अलग भोजन देकर नियंत्रित प्रयोग नहीं किया गया। इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन ने दिमागी प्रतिक्रिया बदली, या दूसरे कारकों का भी योगदान था। निष्कर्षों की पुष्टि के लिए बड़े और बार-बार मस्तिष्क की जांच करने वाले अध्ययन जरूरी हैं। इसे बच्चे की बुद्धि घटने, याददाश्त खराब होने या दिमाग स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होने का प्रमाण भी नहीं कहा जा सकता। इस अध्ययन का मुख्य विषय भोजन संबंधी संकेतों पर प्रतिक्रिया और शरीर की चर्बी में बदलाव था। ‘दिमाग से खेल रहा है’ जैसी भाषा इन निष्कर्षों को वास्तविक प्रमाण से अधिक निश्चित दिखा सकती है।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि बेहतर खानपान की पूरी जिम्मेदारी केवल बच्चों और माता-पिता पर डालना पर्याप्त नहीं होगा। कई परिवारों के लिए तैयार खाद्य पदार्थ सस्ते, आसानी से उपलब्ध और सुविधाजनक होते हैं। अधिक पौष्टिक तथा कम प्रसंस्कृत विकल्पों की उपलब्धता बेहतर करना भी समाधान का हिस्सा है। माता-पिता के लिए अध्ययन का उपयोगी संदेश बच्चे के पूरे खानपान पर ध्यान देना है। किसी एक बार चिप्स या कुकीज खाने को दिमागी नुकसान से जोड़कर डराने के बजाय रोज के भोजन में इनकी हिस्सेदारी पर विचार किया जा सकता है। बच्चे के वजन या भोजन व्यवहार को लेकर चिंता हो तो उसकी जरूरतों के अनुसार बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य आहार विशेषज्ञ से सलाह लें।