मिट्टी के घड़े से छनती रोशनी बनाती है खास नजारा, जानिए झिझिया की परंपरा
भक्ति और संतुलन का दिखता है संगम
लाइफस्टाइल : बिहार की लोकसंस्कृति में अनेक ऐसी कलाएं हैं, जिनमें गीत, नृत्य और सामूहिक भागीदारी एक साथ दिखाई देती है। इन्हीं में शामिल है झिझिया। विशेष रूप से मिथिलांचल से जुड़ा यह लोकनृत्य अपनी प्रस्तुति के कारण अलग पहचान रखता है। महिलाएं सिर पर मिट्टी का छिद्रयुक्त घड़ा रखकर लोकगीतों की लय पर नृत्य करती हैं। घड़े के भीतर जलता दीपक होता है, जिसकी रोशनी छोटे-छोटे छेदों से बाहर निकलती है।
यहां जलता हुआ मटका कहने का आशय घड़े के भीतर रखे दीपक से है। नृत्य के दौरान सिर पर घड़े का संतुलन बनाए रखना प्रस्तुति का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। कदमों की लय के साथ घूमती रोशनी दृश्य को आकर्षक बनाती है। शारदीय नवरात्र में इसकी विशेष प्रस्तुतियां होती हैं।
झिझिया की तैयारी में मिट्टी के घड़े की खास भूमिका होती है। उसमें छोटे-छोटे छेद बनाए जाते हैं और उसे सजाया जाता है। इसके बाद महिलाएं पारंपरिक वस्त्र और आभूषण पहनकर समूह में नृत्य करती हैं। गीतों और वाद्य यंत्रों की धुन के साथ उनके कदम आगे बढ़ते हैं, जबकि सिर पर रखा घड़ा संतुलित रहता है।
इस लोकनृत्य में सामूहिकता प्रमुख है। महिलाएं एक साथ जुटती हैं और गीतों के साथ प्रस्तुति देती हैं। सिर की स्थिति, कदमों की गति और घूमने के अंदाज का तालमेल इसकी पहचान है। घड़े को संभालते हुए नृत्य करना कलाकारों के अभ्यास और कौशल को दर्शाता है।
झिझिया का संबंध लोक आस्था और देवी आराधना से भी है। इसके गीतों में परिवार की खुशहाली और सुरक्षा की कामना की जाती है। कुछ स्थानीय मान्यताएं इसे बुरी नजर और अनिष्ट से बचाव की प्रार्थना से जोड़ती हैं। ये लोकविश्वास इस परंपरा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं।
झिझिया से राजा चित्रसेन और उनकी रानी की लोककथा भी जोड़ी जाती है। हालांकि, लोककथा को नृत्य की उत्पत्ति का प्रमाणित इतिहास नहीं माना जा सकता। इस कला को समझने के लिए उसके गीत, प्रस्तुति और समुदाय में प्रचलित परंपराएं महत्वपूर्ण हैं।
बिहार के शिवहर में नवरात्र के दौरान झिझिया की परंपरा आज भी दिखाई देती है। गांवों की गलियों, देवी स्थानों और पूजा पंडालों में महिलाएं तथा युवतियां इसकी प्रस्तुति देती हैं। लोकगीतों में समाज की खुशहाली और परिजनों की लंबी उम्र की कामना शामिल रहती है।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, पहले बागमती नदी के तट पर भी झिझिया का आयोजन होता था। समय के साथ आयोजन स्थलों में बदलाव आया है और अब गांवों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसकी प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं। तालियों और कदमों का तालमेल इस लोककला को दर्शकों से जोड़ता है।
बिहार की पहचान उसकी विविध लोकपरंपराओं से बनती है। झिझिया उनमें एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी खूबसूरती घड़े और दीपक के दृश्य के साथ उन महिलाओं की सामूहिक प्रस्तुति में भी है, जो गीतों और नृत्य के जरिए इस विरासत को आगे बढ़ाती हैं।