सामाजिक संदेश वाली फिल्मों से क्यों दूर हो रहे दर्शक? कहानी और ‘ज्ञान’ के बीच उलझा सिनेमा
सामाजिक फिल्मों के सामने क्या है चुनौती?
नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा ने मनोरंजन के साथ सामाजिक सवाल उठाने की लंबी परंपरा निभाई है। छुआछूत, महिलाओं के अधिकार, जातिगत भेदभाव और शिक्षा जैसे विषय पर्दे पर आते रहे हैं। ‘दामिनी’, ‘पिंक’ और ‘पैडमैन’ जैसी फिल्मों ने अपने विषयों को चर्चा के केंद्र में पहुंचाया। हालांकि, किसी सामाजिक मुद्दे को चुन लेना कभी भी हर फिल्म की सफलता की निश्चित गारंटी नहीं रहा। अब इस तरह की कई फिल्मों का कमजोर प्रदर्शन एक सवाल जरूर खड़ा करता है—क्या दर्शकों की पसंद बदल रही है या उन्हें आकर्षित करने का तरीका?
हालिया उदाहरणों में करीना कपूर खान की ‘दायरा’ और तापसी पन्नू की ‘अस्सी’ का प्रदर्शन चर्चा में है। रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू बॉक्स ऑफिस पर ‘दायरा’ का कारोबार करीब पांच करोड़ रुपये से कुछ अधिक और ‘अस्सी’ का लगभग दस करोड़ रुपये रहा। इसके मुकाबले महामारी से पहले आई जातिगत भेदभाव पर केंद्रित ‘आर्टिकल 15’ ने 65 करोड़ रुपये से अधिक कमाए थे। हालांकि, अलग बजट और रिलीज परिस्थितियों वाली फिल्मों की कमाई से अकेले दर्शकों की सोच का अंतिम निष्कर्ष निकालना मुश्किल है।
इस बदलाव को समझने के लिए विषय और उसकी प्रस्तुति के बीच का फर्क देखना जरूरी है। सामाजिक समस्या किसी फिल्म को प्रासंगिक बना सकती है, लेकिन दर्शकों की रुचि बनाए रखने के लिए प्रभावशाली किरदार, भावनात्मक जुड़ाव और रोचक घटनाक्रम भी चाहिए। यदि कहानी बार-बार अपना संदेश समझाने लगे और पात्र केवल विचार सुनाने का जरिया बन जाएं, तो फिल्म का अनुभव कमजोर पड़ सकता है। यह रचनात्मक चुनौती है; इसे पूरे दर्शकवर्ग की सामाजिक सवालों से उदासीनता मानना जल्दबाजी होगी।
फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम देखने के बदलते माध्यम को भी एक वजह मानते हैं। उनके अनुसार, गंभीर फिल्में ध्यान और एकाग्रता मांगती हैं, जबकि घर पर देखते समय फोन, नोटिफिकेशन और दूसरे काम अनुभव को बाधित करते हैं। उनका यह भी मानना है कि इंटरनेट से लगातार जानकारी पाने वाला दर्शक कई विषयों पर पहले से अपनी राय बना चुका होता है। ऐसे में फिल्म के सामने परिचित मुद्दे को नए और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की चुनौती बढ़ती है। यह उनका विश्लेषण है, दर्शकों की पसंद पर किसी व्यापक सर्वेक्षण का निष्कर्ष नहीं।
कमजोर कमाई के पीछे प्रचार और उपलब्धता का सवाल भी अहम है। ‘अफवाह’ इसका उदाहरण है। रिलीज के समय आई रिपोर्ट के अनुसार, फिल्म को देशभर में करीब 60 स्क्रीन मिली थीं। सीमित शो और उनकी टाइमिंग को लेकर भी सवाल उठे थे। निर्देशक सुधीर मिश्रा ने अधिक लोगों तक फिल्म पहुंचने की इच्छा जताई थी। ऐसे मामलों में कम टिकट बिक्री को केवल दर्शकों द्वारा विषय खारिज कर देना कहना अधूरी तस्वीर पेश करता है। दर्शक जिस फिल्म के बारे में जानता ही नहीं या जिसका सुविधाजनक शो नहीं मिलता, उसे देखने का फैसला कैसे करेगा?
ओटीटी भी अब निर्माताओं के लिए निश्चित आर्थिक सहारा नहीं है। उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, प्लेटफॉर्म पहले की तरह हर गंभीर फिल्म खरीदने या उसके लिए ऊंची कीमत देने को तैयार नहीं हैं। इससे सिनेमाघरों में सीमित कमाई करने वाली फिल्मों पर अतिरिक्त दबाव आता है। वहीं, वयस्क प्रमाणपत्र मिलने पर परिवार के नाबालिग सदस्य फिल्म नहीं देख सकते, जिससे समूह में सिनेमाघर जाने वाले दर्शकों का चुनाव प्रभावित हो सकता है।
फिल्म को दर्शक जुटाने के लिए मिलने वाला समय भी महत्वपूर्ण है। भूमि पेडनेकर ने ‘भीड़’ और ‘अफवाह’ के कमजोर प्रदर्शन पर निराशा जताते हुए कहा था कि बातचीत अक्सर शुरुआती कमाई तक सीमित रह जाती है। उन्होंने दर्शकों की प्रशंसा से धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाली फिल्मों के लिए अवसर की जरूरत बताई और ‘12वीं फेल’ का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, छोटी फिल्मों को दर्शकों का समर्थन मिलना जरूरी है।
इन उदाहरणों से सामाजिक सिनेमा का भविष्य खत्म होने का निष्कर्ष नहीं निकलता। चुनौती ऐसी कहानी बनाने की है, जिसमें मुद्दा पात्रों के जीवन और संघर्ष से उभरे। साथ ही सही प्रचार, पर्याप्त शो और व्यावहारिक बजट भी जरूरी हैं। दर्शकों तक पहुंचने के लिए अच्छे उद्देश्य को एक प्रभावशाली सिनेमाई अनुभव में बदलना होगा।