नई दिल्ली: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आते ही स्कूलों में भक्ति और उत्सव का माहौल बन जाता है। नन्हे बच्चे कान्हा और राधा का रूप धारण कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। कई स्कूलों में जन्माष्टमी के मौके पर राधा-कृष्ण की झांकियां, नृत्य और भक्ति गीतों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहती हैं।

इन कार्यक्रमों में एक ऐसा कान्हा भक्ति गीत भी है, जो वर्षों से जन्माष्टमी समारोहों की पहचान बना हुआ है। बच्चों की मधुर आवाज, कृष्ण की वेशभूषा और मंच पर राधा-कृष्ण की प्रस्तुति इस गीत को हर साल नया जीवन देती है।
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
कई स्कूलों में जन्माष्टमी पर बच्चों को कृष्ण लीला, मटकी फोड़, भजन और नृत्य के जरिए भगवान श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों से जोड़ा जाता है। छोटे बच्चे मुरली, मोरपंख और पीले वस्त्रों में कान्हा का रूप धारण करते हैं, जबकि बच्चियां राधा के रूप में सजती हैं।
गीतों से बनता है भक्तिमय माहौल
कान्हा के भजन और जन्माष्टमी गीत बच्चों के कार्यक्रमों की जान होते हैं। इन गीतों के जरिए बच्चों को भारतीय संस्कृति, भक्ति और परंपराओं से परिचित कराया जाता है।
25 सालों से निभा रहे राधा कृष्ण की भूमिका
कई परिवारों और स्कूलों में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जहां अलग-अलग पीढ़ियों के बच्चे राधा-कृष्ण बनकर मंच पर प्रस्तुति देते रहे हैं। पुराने शिक्षक बताते हैं कि जन्माष्टमी कार्यक्रम बच्चों के आत्मविश्वास और रचनात्मकता को बढ़ाने का माध्यम भी बनते हैं।
कान्हा की लीलाओं से जुड़ते बच्चे
श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं बच्चों को आकर्षित करती हैं। माखन चोरी, बांसुरी वादन और रासलीला जैसे प्रसंगों को मंच पर दिखाकर बच्चे त्योहार के आध्यात्मिक महत्व को समझते हैं।
जन्माष्टमी के अवसर पर स्कूलों में होने वाली ये प्रस्तुतियां सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी बनती हैं।
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