मनोरंजन : हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे गीत बने हैं, जिन्होंने अपने शब्दों, संगीत और भावनाओं के दम पर पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जगह बनाई है। कुछ गीत बिछड़ते रिश्तों का दर्द बयां करते हैं तो कुछ अधूरे प्यार की ऐसी कहानी सुनाते हैं, जिसे सुनकर आंखें नम हो जाती हैं। इन्हीं कालजयी गीतों में एक नाम है ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’, जिसे हिंदी फिल्म संगीत के सबसे दर्दभरे और भावनात्मक गीतों में गिना जाता है। यह गीत केवल अपने मधुर संगीत के कारण ही नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी भावनात्मक कहानी की वजह से भी आज तक लोगों के दिलों में जीवित है।
यह गीत वर्ष 1959 में रिलीज हुई फिल्म कागज़ के फूल का है। फिल्म का निर्देशन और मुख्य अभिनय गुरु दत्त ने किया था, जबकि अभिनेत्री वहीदा रहमान ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी। फिल्म के गीतों ने उस दौर में भले ही व्यावसायिक सफलता न दिलाई हो, लेकिन समय के साथ यह फिल्म और इसका संगीत भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर बन गए।
फिल्म की कहानी एक सफल फिल्म निर्देशक सुरेश सिन्हा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी वैवाहिक जिंदगी खुशहाल नहीं होती। इसी दौरान उसकी मुलाकात शांति नाम की एक युवती से होती है। सुरेश उसकी प्रतिभा को पहचानता है और उसे अपनी फिल्म में मौका देता है। धीरे-धीरे शांति एक बड़ी फिल्म स्टार बन जाती है। दोनों के बीच गहरा भावनात्मक रिश्ता विकसित होता है, लेकिन सामाजिक परिस्थितियां और पारिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें एक नहीं होने देतीं। अंततः दोनों का प्रेम अधूरा रह जाता है और फिल्म का अंत बेहद मार्मिक होता है।
फिल्म की इस कहानी को कई लोग गुरु दत्त के निजी जीवन से भी जोड़कर देखते हैं। लंबे समय से यह चर्चा रही है कि फिल्म के कई भावनात्मक पहलू उनके व्यक्तिगत अनुभवों और अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ उनके पेशेवर एवं भावनात्मक जुड़ाव से प्रेरित थे। हालांकि इस विषय पर अलग-अलग मत रहे हैं और इसे पूरी तरह प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता, लेकिन फिल्म और वास्तविक जीवन के बीच समानताओं की चर्चा वर्षों से होती रही है।
‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ गीत अपने शब्दों में अधूरे प्रेम, बिछड़ने की पीड़ा और समय की विडंबना को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करता है। गीत के बोल प्रसिद्ध गीतकार कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे, जबकि इसका संगीत एस. डी. बर्मन ने तैयार किया था। इस गीत को महान गायिका गीता दत्त ने अपनी भावपूर्ण आवाज दी, जिसने इसे अमर बना दिया।
गीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें प्रेम का दर्द किसी शोर या शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि बेहद शांत और गहरे एहसास के साथ सामने आता है। इसकी धुन, शब्द और फिल्मांकन तीनों मिलकर ऐसा प्रभाव पैदा करते हैं कि यह गीत दशकों बाद भी श्रोताओं के दिलों को छू जाता है। यही वजह है कि संगीत प्रेमी और फिल्म समीक्षक इसे हिंदी सिनेमा के सबसे भावनात्मक गीतों में शामिल करते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि रिलीज के समय कागज़ के फूल बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थी। हालांकि समय के साथ फिल्म को एक क्लासिक का दर्जा मिला और आज इसे भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है। इसी तरह फिल्म का यह गीत भी धीरे-धीरे लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा और आज भी रेडियो, संगीत कार्यक्रमों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उतनी ही श्रद्धा और भावनाओं के साथ सुना जाता है।
करीब सात दशक बाद भी ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि अधूरे प्रेम, समय की बेरुखी और मानवीय भावनाओं का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इसे हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास के सबसे यादगार और दर्दभरे गीतों में विशेष स्थान प्राप्त है।