7 साल में शुरू किया करियर, 250+ फिल्मों के सुपरस्टार बने ये अभिनेता

Update: 2026-07-21 14:27 GMT

मनोरंजन: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी अदाकारी से करोड़ों लोगों के दिलों पर राज किया। लेकिन कुछ सितारे ऐसे होते हैं, जिनकी लोकप्रियता सिर्फ एक क्षेत्र या देश तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दुनिया भर में उनकी पहचान बन जाती है। तमिल सिनेमा के दिग्गज अभिनेता शिवाजी गणेशन भी ऐसे ही महान कलाकारों में शामिल रहे हैं। अपनी दमदार एक्टिंग, शानदार संवाद अदायगी और अलग-अलग किरदारों को जीवंत करने की क्षमता के कारण उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े अभिनेताओं में गिना जाता है।

शिवाजी गणेशन ने अपने करियर में करीब 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, जिनमें से बड़ी संख्या में उन्होंने लीड हीरो की भूमिका निभाई। तमिल सिनेमा में उन्हें सम्मान से "नडिगर थिलगम" यानी अभिनय की दुनिया का बेताज बादशाह कहा जाता था। उनकी अभिनय प्रतिभा इतनी प्रभावशाली थी कि अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार लॉस एंजिल्स टाइम्स ने उन्हें "दक्षिण भारत का मार्लन ब्रैंडो" तक कहा था।

शिवाजी गणेशन का जन्म 1 अक्टूबर 1928 को तमिलनाडु के तंजावुर जिले में हुआ था। उनका असली नाम विल्लुपुरम चिन्नैया पिल्लै गणेशमूर्ति था। उनका बचपन काफी संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक परेशानियों के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी और महज 7 साल की उम्र में उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रख दिया। उन्होंने शुरुआत थिएटर से की और धीरे-धीरे अपनी कला से लोगों के बीच पहचान बनानी शुरू की।

शिवाजी गणेशन नाम मिलने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। साल 1946 में उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित एक नाटक में उनका किरदार निभाया था। उनके अभिनय से प्रभावित होकर द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख नेता ई. वी. रामासामी पेरियार ने उन्हें सार्वजनिक मंच पर "शिवाजी" की उपाधि दी। इसके बाद वह पूरी दुनिया में शिवाजी गणेशन के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

साल 1952 में उन्होंने फिल्म "पराशक्ति" से बड़े पर्दे पर कदम रखा। यह फिल्म जबरदस्त सफल रही और इसके संवादों ने दर्शकों के बीच खास जगह बनाई। इसके बाद शिवाजी गणेशन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक शानदार फिल्मों में अभिनय किया।

उनकी सबसे यादगार फिल्मों में "वीरपांडिया कट्टाबोम्मन" का नाम प्रमुख है। साल 1959 में आई इस फिल्म में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी का किरदार निभाया था, जिसे आज भी उनके करियर के सबसे बेहतरीन अभिनय में गिना जाता है। इसके बाद 1965 में आई "तिरुविलयाडल" में भगवान शिव के किरदार ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया।

साल 1969 में आई फिल्म "दैव मगन" में उन्होंने ट्रिपल रोल निभाकर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। यह पहली तमिल फिल्म थी जिसे भारत की ओर से ऑस्कर की बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी के लिए भेजा गया था। इसके अलावा "वसंता मालिगई", "त्रिशूलम" जैसी फिल्मों ने भी उन्हें सुपरस्टार का दर्जा दिलाया।

शिवाजी गणेशन की खासियत यह थी कि वह हर तरह के किरदार निभाने में माहिर थे। उन्होंने फैमिली ड्रामा, रोमांस, कॉमेडी, क्राइम थ्रिलर और एक्शन फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। साल 1964 में अपनी 100वीं फिल्म में उन्होंने कई अलग-अलग भूमिकाएं निभाकर दर्शकों को हैरान कर दिया था।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। साल 1960 में मिस्र में आयोजित अफ्रो-एशियन फिल्म फेस्टिवल में "वीरपांडिया कट्टाबोम्मन" के लिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय अभिनेता बने। फ्रांस सरकार ने उन्हें 1995 में "नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स" सम्मान दिया।

इसके अलावा उन्हें 1996 में भारत के सर्वोच्च फिल्म सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान भी मिले। उनके नाम कई फिल्मफेयर साउथ और तमिलनाडु राज्य पुरस्कार भी दर्ज हैं।

शिवाजी गणेशन राजनीति से भी जुड़े रहे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान हमेशा एक महान अभिनेता के रूप में रही। 21 जुलाई 2001 को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में 72 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। हालांकि, उनकी फिल्में और अभिनय आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य विरासत माने जाते हैं। उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा, मेहनत और जुनून से कोई भी कलाकार इतिहास रच सकता है।

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