Bollywood News: बॉलीवुड के इतिहास में कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जिन्हें रिलीज के शुरुआती दिनों में दर्शकों का प्यार नहीं मिला, लेकिन बाद में उन्होंने सफलता की नई कहानी लिख दी। इन फिल्मों ने साबित किया कि किसी फिल्म की सफलता का फैसला केवल पहले दिन या पहले सप्ताह की कमाई से नहीं किया जा सकता। कुछ ऐसा ही किस्सा दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह की साल 1983 में रिलीज हुई फिल्म 'मासूम' से जुड़ा है। इस फिल्म को शुरुआत में दर्शकों का बेहद ठंडा रिस्पॉन्स मिला था। सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या इतनी कम थी कि फिल्म के निर्देशक शेखर कपूर को भी इसके सफल होने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन कुछ दिनों बाद अचानक ऐसा बदलाव आया कि फिल्म सुपरहिट हो गई और आज इसे हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में गिना जाता है।
हाल ही में शेखर कपूर ने अपनी पहली फिल्म 'मासूम' की रिलीज से जुड़ा दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि फिल्म के रिलीज होने के शुरुआती दिनों में सिनेमाघर लगभग खाली रहते थे। लेकिन इसके बाद दर्शकों की भीड़ बढ़ने लगी और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार वापसी की।
शेखर कपूर की पहली फिल्म थी 'मासूम'
साल 1983 में रिलीज हुई 'मासूम' निर्देशक शेखर कपूर की पहली फीचर फिल्म थी। इसमें नसीरुद्दीन शाह और शबाना आजमी मुख्य भूमिकाओं में नजर आए थे। फिल्म में जुगल हंसराज, उर्मिला मातोंडकर और आराधना श्रीवास्तव जैसे बाल कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
फिल्म की कहानी एक परिवार के रिश्तों, विश्वास, भावनाओं और एक बच्चे की मासूमियत के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया गया था।
फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने डीके मल्होत्रा का किरदार निभाया था, जबकि शबाना आजमी उनकी पत्नी इंदु की भूमिका में दिखाई दी थीं। जुगल हंसराज ने राहुल नाम के बच्चे का किरदार निभाया था।आज भी 'मासूम' को उसकी भावनात्मक कहानी, शानदार अभिनय और यादगार संगीत के लिए पसंद किया जाता है।
पहले दिन थिएटर में सिर्फ दो लोग मौजूद थे
शेखर कपूर ने फरवरी 2026 में सोशल मीडिया पर फिल्म की रिलीज से जुड़ा एक अनुभव साझा किया था। उन्होंने बताया कि जब 'मासूम' रिलीज हुई तो वह पहले दिन मुख्य सिनेमाघर में फिल्म देखने पहुंचे।वहां का नजारा देखकर वह हैरान रह गए। पूरे सिनेमाघर में केवल दो लोग मौजूद थे और उनमें से एक वह खुद थे।
शेखर कपूर के मुताबिक, फिल्म को शुरुआत में इतनी कमजोर प्रतिक्रिया मिली कि इसके भविष्य को लेकर चिंता बढ़ गई थी। उस समय फिल्म के टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग भी आम बात थी, लेकिन 'मासूम' के टिकट खरीदने के लिए दर्शक ही नहीं पहुंच रहे थे।निर्देशक ने बताया कि फिल्म के शुरुआती प्रदर्शन से जुड़े कुछ युवकों को आर्थिक नुकसान भी हुआ था। वे इस स्थिति से काफी नाराज थे।
छह दिन बाद अचानक बदल गई फिल्म की किस्मत
'मासूम' की रिलीज के शुरुआती दिनों में सिनेमाघरों में दर्शकों की कमी बनी रही। इसके चलते फिल्म के वितरकों ने भी इसके प्रदर्शन को लेकर उम्मीद छोड़नी शुरू कर दी थी।लेकिन रिलीज के लगभग छह दिन बाद अचानक हालात बदलने लगे। शेखर कपूर ने बताया कि एक गुरुवार को उनके एक दोस्त ने फोन करके फिल्म के टिकट मांगे।शुरुआत में उन्हें लगा कि दोस्त मजाक कर रहा है, क्योंकि अब तक फिल्म देखने के लिए लोग सिनेमाघरों में नहीं पहुंच रहे थे।हालांकि, उसी गुरुवार एक सिनेमाघर में दर्शकों की संख्या अचानक बढ़ गई। अगले दिन शुक्रवार को फिल्म देखने के लिए कतारें लगने लगीं।
इसके बाद सप्ताहांत में फिल्म की मांग और बढ़ गई। जिन वितरकों ने पहले फिल्म से उम्मीद छोड़ दी थी, वे दोबारा इसके प्रदर्शन में दिलचस्पी लेने लगे। देखते ही देखते 'मासूम' सफल फिल्म बन गई।
निर्देशक भी नहीं समझ पाए सफलता का कारण
शेखर कपूर ने बताया कि फिल्म की अचानक सफलता उनके लिए भी हैरान करने वाली थी। शुरुआत में सिनेमाघर खाली थे और फिर कुछ दिनों के भीतर दर्शकों की भीड़ उमड़ने लगी।
आमतौर पर किसी फिल्म की सफलता में दर्शकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया यानी वर्ड ऑफ माउथ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन शेखर कपूर इस बात से हैरान थे कि जब शुरुआती दिनों में बहुत कम लोगों ने फिल्म देखी थी, तो इतनी जल्दी इसकी चर्चा कैसे फैल गई।फिल्म की सफलता का यह किस्सा आज भी बॉलीवुड के दिलचस्प बॉक्स ऑफिस अनुभवों में शामिल है।
'मासूम' की कहानी ने जीता दर्शकों का दिल
फिल्म 'मासूम' की सबसे बड़ी ताकत इसकी भावनात्मक कहानी मानी जाती है। फिल्म में एक ऐसे परिवार को दिखाया गया है, जिसकी सामान्य जिंदगी अचानक एक पुराने रिश्ते का सच सामने आने से बदल जाती है।
नसीरुद्दीन शाह का किरदार एक ऐसे बच्चे को अपने परिवार में लाता है, जिसके अस्तित्व के बारे में उसकी पत्नी को पहले जानकारी नहीं होती।इसके बाद परिवार के रिश्तों में तनाव पैदा होता है। बच्चे की मासूमियत और परिवार के सदस्यों की भावनाओं के बीच कहानी आगे बढ़ती है।शबाना आजमी ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया, जो अपने पति के अतीत का सच जानने के बाद भावनात्मक संघर्ष से गुजरती है।फिल्म में जुगल हंसराज के अभिनय को भी विशेष रूप से याद किया जाता है।
फिल्म के गाने आज भी हैं लोकप्रिय
'मासूम' केवल अपनी कहानी और अभिनय के लिए ही नहीं, बल्कि संगीत के लिए भी जानी जाती है।फिल्म का संगीत आर.डी. बर्मन ने तैयार किया था, जबकि गीत गुलजार ने लिखे थे।फिल्म के लोकप्रिय गीतों में 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी', 'लकड़ी की काठी' और 'हुजूर इस कदर' शामिल हैं।'लकड़ी की काठी' बच्चों के बीच आज भी लोकप्रिय है, जबकि 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी' को हिंदी सिनेमा के भावनात्मक गीतों में विशेष स्थान मिला हुआ है।इन गीतों ने फिल्म की लोकप्रियता को लंबे समय तक बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
'हनुमान अंश' की सफलता से फिर चर्चा में आया किस्सा
साल 2026 में रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' ने भी बॉक्स ऑफिस पर धीमी शुरुआत के बाद जबरदस्त सफलता हासिल की।
निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की इस फिल्म को शुरुआत में सीमित सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था। शुरुआती दिनों में दर्शकों की संख्या कम रही, लेकिन तीसरे सप्ताह से फिल्म की कमाई में तेजी आई।
बाद में फिल्म ने लंबे समय तक सिनेमाघरों में अच्छा प्रदर्शन किया।
अक्टूबर
के शुरुआती दिनों तक इसके विश्वव्यापी कारोबार के 400 करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई थी।
हालांकि, 'हनुमान अंश' और 'मासूम' की कहानियां अलग हैं, लेकिन दोनों फिल्मों की शुरुआती कमजोर प्रतिक्रिया और बाद में मिली सफलता के बीच एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है।
चार दशक बाद भी याद की जाती है 'मासूम'
फिल्म 'मासूम' को रिलीज हुए चार दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन इसका प्रभाव आज भी हिंदी सिनेमा में दिखाई देता है।शेखर कपूर के निर्देशन, शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह के अभिनय तथा फिल्म की भावनात्मक कहानी ने इसे अलग पहचान दिलाई।अब शेखर कपूर 'मासूम: द नेक्स्ट जेनरेशन' नाम की नई फिल्म से भी जुड़े हैं, जिसमें मूल फिल्म के कुछ कलाकारों की वापसी की योजना है।
'मासूम' की सफलता का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस फिल्म के लिए शुरुआत में दर्शक नहीं मिल रहे थे, वही आगे चलकर हिंदी सिनेमा की प्रतिष्ठित फिल्मों में शामिल हो गई। यह किस्सा बताता है कि कई बार किसी फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने और अपनी पहचान बनाने में थोड़ा अधिक समय लगता है।
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