मुंबई। नवरात्रि का त्योहार हो और फाल्गुनी पाठक के गानों की गूंज सुनाई न दे, ऐसा होना मुश्किल है। अपनी सुरीली आवाज और गरबा गीतों से लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाने वाली फाल्गुनी पाठक आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। लेकिन उनकी सफलता की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। मुंबई के एक गुजराती परिवार में जन्मीं फाल्गुनी को महज चार साल की उम्र से संगीत का शौक था। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में वह रेडियो पर बजने वाले गानों को ध्यान से सुनती थीं। धीरे-धीरे संगीत के प्रति उनका लगाव बढ़ता गया। नौ साल की उम्र में उन्होंने पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी। कभी एक कार्यक्रम में गाने के लिए महज 25 रुपये पाने वाली यही बच्ची आगे चलकर देश की मशहूर गायिका और 'डांडिया क्वीन' बन गई।
बचपन से ही संगीत की दीवानी थीं फाल्गुनी
फाल्गुनी पाठक का जन्म मुंबई के एक गुजराती परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके घर में गुजराती लोकसंगीत और हिंदी फिल्मी गीतों का माहौल था।फाल्गुनी को रेडियो पर गाने सुनना बेहद पसंद था। वह लता मंगेशकर और आशा भोसले के गीतों को सुनकर उन्हें गुनगुनाने का प्रयास करती थीं।धीरे-धीरे संगीत उनकी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।उन्होंने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि चार साल की उम्र से ही उन्हें गाने का शौक था। हालांकि, उन्होंने बचपन में संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी।इसके बावजूद संगीत के प्रति लगाव और लगातार अभ्यास ने उनकी गायकी को अलग पहचान दी।
नौ साल की उम्र में पहली बार मंच पर गाया
फाल्गुनी पाठक की जिंदगी का एक यादगार पल तब आया, जब उन्होंने नौ साल की उम्र में पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाना गाया।यह कार्यक्रम नौसेना दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था।
फाल्गुनी ने फिल्म 'कुर्बानी' का लोकप्रिय गीत 'लैला मैं लैला' प्रस्तुत किया।उनकी आवाज सुनकर कार्यक्रम में मौजूद लोग प्रभावित हुए और उन्हें फिर से गाने का अवसर मिला।इस प्रस्तुति ने उनके मन में मंच पर गाने का आत्मविश्वास पैदा किया।हालांकि, उनके पिता शुरुआत में सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाने के पक्ष में नहीं थे। फाल्गुनी ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि पहली प्रस्तुति के बाद उन्हें पिता की नाराजगी का सामना करना पड़ा था।बाद में परिवार ने उनके संगीत के प्रति समर्पण को स्वीकार किया।
पहली कमाई के रूप में मिले थे 25 रुपये
आज फाल्गुनी पाठक बड़े संगीत समारोहों और नवरात्रि आयोजनों का जाना-पहचाना नाम हैं।लेकिन उनके संगीत सफर की शुरुआत बेहद साधारण थी।उन्होंने एक बातचीत में बताया था कि शुरुआती दिनों में गणपति उत्सव और शादी समारोहों में गाने के लिए उन्हें कभी-कभी महज 25 रुपये मिलते थे।उस समय उनके लिए पैसों से ज्यादा महत्वपूर्ण मंच पर प्रस्तुति देने का अवसर था।वह छोटे कार्यक्रमों में गाती रहीं और धीरे-धीरे लोगों के बीच उनकी पहचान बनने लगी।नियमित मंचीय प्रस्तुतियों ने उन्हें दर्शकों की पसंद समझने का अवसर दिया।
गुजराती लोकसंगीत से मिली खास पहचान
फाल्गुनी पाठक के संगीत सफर में गुजराती लोकगीतों की विशेष भूमिका रही है।गुजराती परिवार में पली-बढ़ी होने के कारण वह बचपन से गरबा और डांडिया गीत सुनती थीं।जब उन्होंने स्थानीय नवरात्रि कार्यक्रमों में गाना शुरू किया, तो उनकी आवाज और प्रस्तुति लोगों को पसंद आने लगी।उन्होंने पारंपरिक गुजराती लोकधुनों को आधुनिक संगीत के साथ प्रस्तुत करना शुरू किया।यही शैली आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।फाल्गुनी की गायकी में लोकसंगीत की मिठास और मंचीय प्रस्तुति का उत्साह एक साथ देखने को मिलता है।
1998 में आया पहला म्यूजिक एल्बम
फाल्गुनी पाठक ने लंबे समय तक लाइव कार्यक्रमों में अपनी पहचान बनाने के बाद इंडी-पॉप संगीत की दुनिया में कदम रखा।वर्ष 1998 में उनका पहला लोकप्रिय एल्बम 'याद पिया की आने लगी' रिलीज हुआ।इस एल्बम के गीतों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई।उस दौर में म्यूजिक चैनलों पर उनके गीतों के वीडियो खूब देखे जाते थे।उनके संगीत में रोमांस, मासूमियत और भारतीय पारिवारिक भावनाओं की झलक दिखाई देती थी।फाल्गुनी की अलग आवाज और सहज गायन शैली ने उन्हें दूसरी गायिकाओं से अलग पहचान दिलाई।
'मैंने पायल है छनकाई' ने बनाया सुपरस्टार
फाल्गुनी पाठक के करियर में 'मैंने पायल है छनकाई' गाने का विशेष स्थान है।वर्ष 1999 में आया यह गीत बेहद लोकप्रिय हुआ।गाने की मधुर धुन और संगीत वीडियो की कहानी ने युवाओं का ध्यान आकर्षित किया।
इसके बाद 'मेरी चुनर उड़ उड़ जाए', 'अइयो रामा' और अन्य गीतों ने भी उन्हें लोकप्रियता दिलाई।1990 के दशक के आखिर और 2000 के शुरुआती वर्षों में फाल्गुनी के गाने भारतीय पॉप संगीत की पहचान बन गए थे।आज भी उनके पुराने गीतों को संगीत प्रेमी सुनना पसंद करते हैं।
आखिर क्यों कहा जाता है 'डांडिया क्वीन'?
फाल्गुनी पाठक को 'डांडिया क्वीन' कहे जाने के पीछे उनकी लंबे समय से चली आ रही नवरात्रि प्रस्तुतियों का योगदान है।नवरात्रि के दौरान उनके लाइव कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोग हिस्सा लेते हैं।उनकी आवाज पर हजारों लोग गरबा और डांडिया करते हैं।
फाल्गुनी पारंपरिक गुजराती गीतों के साथ बॉलीवुड और लोकप्रिय संगीत को भी प्रस्तुत करती हैं।उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि नवरात्रि की तैयारियां लगभग एक महीने पहले शुरू कर देती हैं।इसके लिए वह गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों के लोकगीत सुनती हैं और नई धुनों को अपनी प्रस्तुतियों में शामिल करने का प्रयास करती हैं।
फिल्मों से ज्यादा लाइव संगीत को दी प्राथमिकता
फाल्गुनी पाठक ने हिंदी फिल्मों के लिए भी गाने गाए हैं, लेकिन उन्होंने अपने करियर में लाइव कार्यक्रमों और स्वतंत्र संगीत को विशेष महत्व दिया।उनकी पहचान सिर्फ पार्श्वगायिका के रूप में नहीं, बल्कि एक बेहतरीन मंचीय कलाकार के रूप में बनी।
वह देश के विभिन्न शहरों के अलावा विदेशों में भी प्रस्तुति देती रही हैं।उनके संगीत कार्यक्रमों में पारंपरिक लोकगीतों से लेकर लोकप्रिय रोमांटिक गीतों तक का मिश्रण देखने को मिलता है।फाल्गुनी ने वर्षों तक अपनी गायकी के माध्यम से अलग-अलग पीढ़ियों के संगीत प्रेमियों को जोड़े रखा है।
अपने खास अंदाज से भी बनाई पहचान
फाल्गुनी पाठक की पहचान उनकी आवाज के साथ उनके पहनावे से भी जुड़ी हुई है।वह आमतौर पर आरामदायक पैंट, शर्ट, जैकेट और छोटे बालों वाले अपने खास अंदाज में नजर आती हैं।उन्होंने पुराने इंटरव्यू में बताया था कि बचपन से ही उन्हें इसी तरह के कपड़े पहनना पसंद है।उनके लिए मंच पर सहज महसूस करना अधिक महत्वपूर्ण रहा है।फाल्गुनी का यही अंदाज वर्षों से उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना हुआ है।
नवरात्रि 2026 में भी गूंज रहे फाल्गुनी के गीत
वर्ष 2026 के नवरात्रि समारोहों में भी फाल्गुनी पाठक की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।मुंबई में आयोजित गरबा कार्यक्रमों में उनके गीतों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और संगीत प्रेमी नृत्य कर रहे हैं।14 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के अनुसार, मुंबई के बीकेसी स्थित जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में उनके कार्यक्रम में अभिनेत्री भाग्यश्री भी शामिल हुई थीं।
इस दौरान फाल्गुनी ने अपने लोकप्रिय गीत प्रस्तुत किए और दर्शकों ने गरबा का आनंद लिया।25 रुपये से शुरू हुआ सफर बना प्रेरणादायक कहानीफाल्गुनी पाठक की संगीत यात्रा मेहनत, लगन और अपनी रुचि के प्रति समर्पण की कहानी है।चार साल की उम्र में संगीत से शुरू हुआ लगाव नौ साल की उम्र में मंच तक पहुंचा।महज 25 रुपये की शुरुआती कमाई के बाद उन्होंने लगातार कार्यक्रमों के जरिए अपनी पहचान बनाई।इसके बाद लोकप्रिय म्यूजिक एल्बम और नवरात्रि की प्रस्तुतियों ने उन्हें देशभर में प्रसिद्ध कर दिया।