दिल्ली में खत्म हुआ JFF का सफर अब UP में सजेगा फिल्म फेस्टिवल का रंग
JFF का जादू अब उत्तर प्रदेश में पहुंचेगा फिल्मी कारवां
नई दिल्ली : सिनेमा प्रेमियों के लिए खास रहे जागरण फिल्म फेस्टिवल यानी JFF का दिल्ली चरण यादगार पलों के साथ संपन्न हो गया है। फिल्म निर्माण की बारीकियों से लेकर कलाकारों के संघर्ष और बदलते भारतीय सिनेमा तक, इस मंच पर कई दिलचस्प चर्चाएं देखने को मिलीं। निर्देशक इम्तियाज अली ने जहां सिनेमा और कहानी कहने से जुड़े अपने अनुभव साझा किए, वहीं बॉबी देओल और तापसी पन्नू जैसे कलाकारों ने अपने करियर के उतार-चढ़ाव और संघर्ष के बारे में खुलकर बात की।
दिल्ली में आयोजित फेस्टिवल में फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ कलाकारों, निर्देशकों और सिनेमा से जुड़े लोगों के संवाद भी आकर्षण का केंद्र रहे। दर्शकों को बड़े पर्दे पर अलग-अलग तरह की फिल्में देखने के साथ यह जानने का मौका मिला कि कैमरे के पीछे किसी कहानी को पर्दे तक पहुंचाने के लिए कितनी मेहनत और तैयारी की जाती है।
फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली का सत्र खास चर्चा में रहा। ‘जब वी मेट’, ‘रॉकस्टार’, ‘तमाशा’ और ‘हाईवे’ जैसी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले इम्तियाज ने कहानी, किरदार और फिल्म निर्माण से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उनके सिनेमा में सफर, रिश्ते और किरदारों की अंदरूनी दुनिया को खास जगह मिलती रही है। ऐसे में सिनेमा सीखने और समझने वाले युवाओं के लिए उनकी बातचीत महत्वपूर्ण रही।
फेस्टिवल में बॉबी देओल की मौजूदगी ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। बॉबी ने अपने फिल्मी सफर के दौरान आए अच्छे और मुश्किल दौर पर चर्चा की। एक समय लगातार फिल्मों में नजर आने के बाद उनके करियर में ऐसा दौर भी आया, जब बड़े प्रोजेक्ट्स कम होने लगे थे। इसके बाद उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म और अलग तरह के किरदारों के जरिए वापसी की। ‘आश्रम’ और ‘एनिमल’ जैसे प्रोजेक्ट्स ने उनके करियर को एक नई दिशा दी।
बॉबी देओल का सफर इस बात का उदाहरण बनकर सामने आया कि फिल्म इंडस्ट्री में सफलता हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कलाकार को बदलते समय के साथ खुद को नए किरदारों और नए माध्यमों के लिए तैयार रखना पड़ता है। उनकी बातचीत में करियर के संघर्ष के साथ वापसी की कहानी भी प्रमुख रही।
तापसी पन्नू ने भी अपने अनुभव साझा किए। दक्षिण भारतीय फिल्मों से अभिनय की शुरुआत करने वाली तापसी ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई है। ‘पिंक’, ‘नाम शबाना’, ‘मुल्क’, ‘थप्पड़’ और ‘हसीन दिलरुबा’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए हैं। बिना पारंपरिक फिल्मी पृष्ठभूमि के इंडस्ट्री में जगह बनाने के उनके सफर में कई चुनौतियां रही हैं।
JFF जैसे फिल्म फेस्टिवल की खासियत केवल फिल्मों का प्रदर्शन नहीं है। यहां दर्शकों को फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों के विचार सुनने और सिनेमा को करीब से समझने का मौका मिलता है। फिल्म निर्माण में दिलचस्पी रखने वाले युवाओं के लिए ऐसे सत्र किसी क्लास की तरह होते हैं, जहां किताबों से अलग वास्तविक अनुभवों के जरिए सिनेमा की दुनिया को समझा जा सकता है।
दिल्ली चरण में अलग-अलग भाषाओं और विषयों पर आधारित फिल्मों ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। भारतीय सिनेमा अब केवल मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं है। क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों और स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के काम को भी दर्शकों के बीच लगातार पहचान मिल रही है। फिल्म फेस्टिवल ऐसे सिनेमा को नए दर्शकों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण मंच बनते हैं।
दिल्ली में आयोजन पूरा होने के बाद अब JFF का कारवां उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ने वाला है। वहां भी फिल्म प्रेमियों को फिल्मों की स्क्रीनिंग और सिनेमा से जुड़ी हस्तियों के साथ संवाद का मौका मिलने की उम्मीद है। अलग-अलग शहरों तक पहुंचने की वजह से यह फेस्टिवल उन दर्शकों को भी बड़े फिल्म आयोजनों से जोड़ता है, जिन्हें आम तौर पर ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने का मौका कम मिलता है।
दिल्ली में इम्तियाज अली से सिनेमा के गुर सीखने और बॉबी देओल तथा तापसी पन्नू के संघर्ष की कहानियां सुनने के बाद अब उत्तर प्रदेश में JFF के अगले पड़ाव को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। सिनेमा, कलाकार और दर्शकों को एक मंच पर लाने वाला यह सफर अब नए शहर और नई महफिल के साथ आगे बढ़ेगा।