विदेशी धुन और गीता दत्त की नशीली आवाज: 72 साल पुराना कल्ट सॉन्ग

Update: 2026-07-24 11:52 GMT

मनोरंजन: हिंदी सिनेमा और बॉलीवुड संगीत का इतिहास जितना स्वर्णिम रहा है, उतना ही यह विदेशी धुनों से प्रेरणा लेने या उन्हें कॉपी करने के विवादों से भी घिरा रहा है। आर.डी. बर्मन से लेकर अनु मलिक और प्रीतम जैसे बड़े-बड़े दिग्गज संगीतकारों पर विदेशी गानों की धुनों को बिना क्रेडिट दिए अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन विदेशी धुनों को भारतीय रंग में ढालकर अमर बना देने का यह सिलसिला आज का नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। साल 1954 में रिलीज हुआ बॉलीवुड का एक ऐसा ही कल्ट और सदाबहार गाना है, जिसे क्यूबा के एक मशहूर विदेशी ट्रैक से कॉपी किया गया था। बावजूद इसके, भारतीय श्रोताओं के दिलों पर इस गाने का जादू ऐसा चढ़ा कि यह आज भी लोगों की जुबान पर छाया हुआ है।

हम बात कर रहे हैं गुरु दत्त के निर्देशन में बनी कालजयी फिल्म 'आर पार' के बेहद लोकप्रिय और ब्लॉकबस्टर गाने 'बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना' की। इस प्रतिष्ठित गाने को अपनी मखमली और नशीली आवाज से सजाया था महान गायिका गीता दत्त ने, जबकि इसके यादगार और अर्थपूर्ण बोल लिखे थे मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि इस सुपरहिट गाने की धुन और रिदम क्यूबा (Cuban) के बेहद प्रसिद्ध गाने 'कीसास, कीसास, कीसास' (Quizas, Quizas, Quizas) से प्रेरित और कॉपी की गई थी।

मूल क्यूबन गाने 'Quizas, Quizas, Quizas' को साल 1947 में क्यूबा के महान संगीतकार ओस्वाल्डो फैरेस (Osvaldo Farres) ने कंपोज किया था, जो लैटिन अमेरिका और पश्चिमी देशों में बेहद लोकप्रिय हुआ था। जब महान संगीतकार ओ.पी. नैय्यर (O.P. Nayyar) ने इस धुन को सुना, तो उन्होंने इसे भारतीय वाद्ययंत्रों, लय और देशी अंदाज़ में ढालकर 'बाबूजी धीरे चलना' का रूप दे दिया। ओ.पी. नैय्यर के बेहतरीन म्यूजिक अरेंजमेंट और गीता दत्त की गायकी ने इस कॉपी की गई धुन को भारतीय संगीत इतिहास का एक मास्टरपीस बना दिया।

फिल्म 'आर पार' एक क्लासिक रोमांटिक-कॉमेडी और क्राइम थ्रिलर ड्रामा थी, जिसकी कहानी एक टैक्सी ड्राइवर कालू (गुरु दत्त) और उसकी प्रेमिका निक्की के इर्द-गिर्द घूमती है। यह गाना खूबसूरत अभिनेत्री शकीला पर फिल्माया गया था। 1954 में जब यह फिल्म और इसका म्यूजिक एल्बम रिलीज हुआ, तो 'बाबूजी धीरे चलना' गाने ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। उस दौर में देश के हर शहर, गली-मोहल्ले, चाय की टपरी और रेडियो पर सिर्फ और सिर्फ इसी गाने की धुन गूंजती थी।

गीता दत्त ने जिस नज़ाकत, चंचलता और नशीले अंदाज़ के साथ इस गाने को गाया, उसने इसे सिर्फ एक हिट गाना नहीं बल्कि एक 'कल्ट क्लासिक' बना दिया। यद्यपि आज के दौर में रीमेक और कॉपी गानों पर ओरिजिनलिटी खत्म करने का आरोप लगता है, लेकिन 72 साल पहले क्यूबन संगीत से चुराई गई इस धुन को भारतीय संगीतकारों और गीता दत्त के सुरों ने इस कदर अपने नाम कर लिया कि आज यह गाना हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुका है।

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