केरल के कद्दावर कांग्रेसी नेता श्री पीसी चाको ने देश के वरिष्ठतम सक्रिय राजनेता श्री शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण करके देशवासियों को यह सन्देश बहुत चतुरता के साथ देने की कोशिश की है कि वे कांग्रेस की मूल विचारधारा से कहीं कोई समझौता न करते हुए एक कांग्रेस छोड़ कर दूसरी कांग्रेस में जा रहे हैं। यदि गौर से देखा जाये तो श्री शरद पंवार आज देश के सबसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी हैं।
हालांकि उन्होंने 1998 में अतिम बार कांग्रेस छोड़ कर अपनी अलग कांग्रेस पार्टी बनाने से पूर्व भी कई बार कांग्रेस पार्टी में आना-जाना किया था। जहां तक श्री चाको का सवाल है तो उन्होंने पहली बार कांग्रेस छोड़ी है। मगर इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा हो रहा है कि क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश में मजबूत राजनीतिक विकल्प देने की गरज से सभी कांग्रेस पार्टियों को एक झंडे के नीचे नहीं आना चाहिए? इसमें आश्चर्य चकित होने की जरूरत नहीं है कि आज देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलावा प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, आन्ध्र प्रदेश में वाईएसआर रेड्डी कांग्रेस, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस मुख्य रूप से वजूद में हैं और सभी अपने-अपने राज्यों की सत्तारूढ़ पार्टियां हैं परन्तु व्यक्तित्वों के टकराव की वजह से इनके नेता अपनी-अपनी कांग्रेस बनाये हुए हैं।
चाको के राष्ट्रवादी कांग्रेस में प्रवेश से यह प्रश्न भी खुला हुआ लगता है कि यदि सभी कांग्रेस आपस में विलय नहीं कर पाती हैं तो देश की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए कम से कम समन्वय समिति का गठन तो कर सकती हैं।
हमें भारत का पिछली सदी का इतिहास बताता है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर विचार िवविधता को आजादी के आन्दोलन के समय से ही बहुत महत्व दिया जाता था। इसी वजह से आजादी मिलने के बाद जनसंघ व कम्युनिस्टों को छोड़ कर शेष सभी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस से ही निकलीं। श्री शरद पंवार ने 1998 में अपनी अलग पार्टी विदेशी मूल के व्यक्ति के प्रधानमन्त्री पद पर आसीन होने की संभावना के मुद्दे पर बनाई थी परन्तु बाद में उन्होंने उसी कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राज्य महाराष्ट्र से लेकर केन्द्र में सहयोग किया। इससे यही सिद्ध हुआ कि यह व्यक्तिमूलक तात्कालिक मुद्दा था जो समय गुजरने के साथ स्वयं ही समाप्त हो गया परन्तु शरद पंवार जैसे सुविज्ञ और नीतिवान राजनीतिज्ञ ने भारतीय राजनीति में विदेशी मूल के मुद्दे को सदा के लिए समाप्त भी कर डाला।
दरअसल श्री पंवार जमीन के नेता हैं जो महाराष्ट्र की राजनीति से उभर कर राष्ट्रीय नेता बने हैं। वह भारतीय लोगों की मानसिकता से भली-भांति परिचित भी हैं । इस हकीकत को पहचानते हुए ही श्री चाको ने उनका दामन पकड़ा है।
इस घटना से इतना तो कहा ही जा सकता है कि श्री चाको की नीयत खराब नहीं है और वह राजनीति में 'बरसाती मेढक' नहीं बनना चाहते। उन्होंने केरल के चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों को टिकट बांटने के मुद्दे पर पार्टी छोड़ी और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि व्यावहारिक रूप में कांग्रेस पार्टी सही निर्णय नहीं ले रही है और गुटबाजी में फंस गई है। मगर उन पर अवसरवादी होने का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि वह प. बंगाल की तरह तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर किसी दूसरे कांग्रेस विरोधी विचारधारा वाले दल में शामिल नहीं हुए हैं।
श्री चाको ने श्री शरद पंवार की पार्टी की सदस्यता लेने से पहले कांग्रेस के कथित 'जी–23 समूह' के लोगों से भी बातचीत की। खास कर गुलाम नबी आजाद से। यह तो मालूम नहीं है कि उनकी इन लोगों से क्या बात हुई मगर इसका मन्तव्य यह जरूर निकाला जा सकता है कि उन्होंने जी-23 के नेताओं को यह सन्देश जरूर दिया कि उन सबके लिए भी राष्ट्रवादी कांग्रेस सम्मानित व सुरक्षित स्थान हो सकता है। फिलहाल यह केवल संभावना मात्र ही है मगर इसमें मजबूत विपक्ष बनाने की संभावनाएं भी छिपी हुई हैं। हकीकत यह है कि श्री शरद पंवार आज देश के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ राजनीतिज्ञ हैं। महाराष्ट्र में उनकी शुरूआत किसानों की मांगों से ही शुरू हुई थी। लगातार दस वर्ष तक वह यूपीए की दोनों सरकारों में कृषि मन्त्री रहे और उनके कार्यकाल में कृषि क्षेत्र जम कर फलाफूला भी।
उन्हें कृषि प्रबन्धन का माहिर माना जाता है जिसका राजनीतिक महत्व वर्तमान में चल रहे किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में खास हो जाता है। यह तो हर राजनीतिक विद्यार्थी जानता है कि लोकतन्त्र में सशक्त विपक्ष ही इसकी सफलता की गारंटी होता है। अतः सभी कांग्रेसी नेताओं या क्षत्रपों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वे सदियों की गुलामी के बाद प्राप्त किये गये लोकतन्त्र को मजबूत बनायें और इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मुद्दा न होने दें परन्तु जमीन पर 'उल्टे बांस बरेली' को जा रहे हैं और कांग्रेसी ही कांग्रेसियों से लड़ रहे हैं। सौभाग्य से अभी शरद पंवार जैसा सुलझा हुआ लोकप्रिय नेता सक्रिय राजनीति में है।
उनके अनुभव का सभी कांग्रेसियों को लाभ उठाना चाहिए और मजबूत विपक्ष का निर्माण करना चाहिए। राजनीति का लक्ष्य देश सेवा ही होता है और वक्त जब जिस बात की मांग करे उसे मानना राजनीतिज्ञों का धर्म होता है। राजनीति का पहला नियम लोकतन्त्र में यह भी बताया गया है कि इसमें सत्ता में आने और सत्ता करने की राजनीति अलग-अलग होती है। मगर हो यह रहा है कि प. बंगाल में कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं। यह 'कबीरदास' की 'उलट बांसी' नहीं तो और क्या है।