वैक्सीन का संकट आखिर है कितना गहरा, क्या वाकई भारत में वैक्सीनेशन कम हुआ है?

देश में वैक्सीन (Vaccine) की कितनी कमी है? क्या वाकई हाहाकार मचा है?

Update: 2021-05-27 09:57 GMT

जनता से रिश्ता वेबडेस्क | सुष्मित सिन्हा  देश में वैक्सीन (Vaccine) की कितनी कमी है? क्या वाकई हाहाकार मचा है? क्या वाकई भारत (India) वैक्सीन के मामले में पीछे रह गया है? इन सारे सवालों पर मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म (Social Media) पर बहस चल रही हैं. कोविड के भयावह हालात के बीच माहौल इसी पक्ष में है कि वैक्सीन के मामले में भारत काफी पिछड़ा हुआ है. यह सही है कि प्रतिशत में देखेंगे तो भारत पीछे दिखाई देगा. लेकिन 135 करोड़ की आबादी के बीच प्रतिशत कई बार गलत तस्वीर दिखाता है. आंकड़ों के बारे में वैसे भी कहा जाता है कि इसमें सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की काबिलियत होती है. जाकी रही भावना जैसी, वो वैसे ही आंकड़ों को अपने मुताबिक ढाल सकता है.

हम एक नजर आंकड़ों पर डालते हैं. 24 मई के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो चीन (China) सबसे आगे हैं. चीन शुरू से ही सबसे आगे है. वहां 50 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन डोज दी जा चुकी हैं. यानि 35 फीसदी से भी ज्यादा. दूसरे नंबर पर अमेरिका (America) है. वहां पर करीब 85 फीसदी लोगों को पहली डोज दी जा चुकी है. कुल 28 करोड़ से ज्यादा डोज दी गई हैं. तीसरे नंबर पर भारत है. भारत में 24 मई तक 19 करोड़ से ज्यादा डोज दे दी गई थी. अब यह आंकड़ा 20 करोड़ पार कर गया है. 20 करोड़ डोज कम नहीं होती. चौथे नंबर पर ब्रिटेन है, जहां भारत से एक तिहाई कम वैक्सीन लगी हैं. इससे फर्क समझा जा सकता है. ध्यान रखने की बात यह भी है कि चीन और अमेरिका ने भारत से काफी पहले वैक्सीनेशन (Vaccination) शुरू किया था.
भारत में 16 जनवरी से शुरू हुई थी वैक्सीनेशन
भारत में 16 जनवरी से वैक्सीनेशन की शुरुआत हुई थी. पहले चरण में हेल्थ वर्कर और फ्रंटलाइन वर्कर को वैक्सिनेट किया गया. 1 मार्च से 60 साल से ऊपर के लोगों को वैक्सीन देने की प्रक्रिया शुरू हुई. इसी दिन 45 साल के ऐसे लोगों को भी वैक्सीन देना शुरू किया गया, जो किसी ऐसी बीमारी का शिकार हैं, जिसमें कोविड की वजह से उनकी जान को खतरा है. यहां हमें देखना पड़ेगा कि 16 जनवरी वाले पहले चरण में वैक्सीनेशन के लिए उत्सुकता बेहद कम थी. यहां तक कि तमाम ऐसे डॉक्टर्स भी थे, जिन्हें वैक्सीन पर भरोसा नहीं था. राजनीतिक गलियारे में भी इसे लेकर आलोचना हो रही थी. कोई कोवैक्सिन को लेकर नाखुश था कि बिना तीसरे फेज का ट्रायल पब्लिश हुए उसे स्वीकृति कैसे दी गई. किसी ने इसे बीजेपी की वैक्सीन करार दे दिया.
ढेर सारी आशंकाएं थीं. यह सही है कि आशंकाएं दूर करने का काम सरकार को और बेहतर तरीके से करना चाहिए था. लेकिन यह भी सही है कि महामारी में अफवाहें या आशंकाएं फैलाने से बचना बहुत जरूरी है. खासतौर पर अगर आपकी बात को जनता मानती हो, सुनती हो तो उस समय बेहद सावधानी की जरूरत है. यहां तक कहा गया कि वैक्सीन भरोसेमंद नहीं, इसीलिए प्रधानमंत्री सहित सरकार के मंत्री भी इसे नहीं लगवा रहे हैं.
एक मार्च के बाद से आई वैक्सीनेशन में तेज़ी
वैक्सीनेशन में तेजी आई 1 मार्च के बाद, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैक्सीन लगवा ली. हालांकि उसके बाद भी सेंटर्स खाली पड़े थे. 60 साल की उम्र से ज्यादा के लोगों के लिए वैक्सीनेशन था, लेकिन ज्यादातर लोग यह देखना चाहते थे कि दूसरे लोगों पर इसका क्या असर हो रहा है, उसके बाद ही वैक्सीन लगवाई जाए. अगर कोविड की दूसरी लहर नहीं आती, तो शायद हम वैक्सीन की कमी का जिक्र ही नहीं कर रहे होते. कोविड की लहर आई, तो अचानक लोगों की भीड़ उमड़ी. उसी वक्त सरकार भी दबाव में आई. 1 अप्रैल से 45 साल से ऊपर के लोगों के लिए वैक्सीनेशन शुरू किया गया.
1 मई से 18 साल से ऊपर के लोगों को भी लगने लगी थी वैक्सीन
असली समस्या आई, जब 1 मई से 18 साल से ऊपर के लोगों को वैक्सीन देना शुरू किया गया. यहां से वैक्सीन के लिए हाहाकार मचना शुरू हुआ. जाहिर है, कोई भी सरकार लोगों को मरते नहीं देखना चाहेगी. ऐसे में दबाव आएगा. लेकिन यह समझना जरूरी है कि ब्रिटेन जैसे देश ने अब जाकर 30 साल से ऊपर के लोगों के लिए वैक्सीनेशन प्रक्रिया शुरू की है. यानी 18 से 29 साल के लोगों को अभी और इंतजार करना होगा.
अप्रैल के मुकाबले मई में वैक्सीनेशन कम क्यों
एक और जगह समस्या आई. 16 जनवरी से 31 मार्च के बीच साढ़े छह करोड़ लोगों को वैक्सीन डोज दी गई. अप्रैल में नौ करोड़ और लोगों को वैक्सीन दी गई. लेकिन मई में अब तक यह करीब पांच करोड़ है. अभी कुछ दिन बाकी हैं. लेकिन जितने दिन बचे हैं और जितनी वैक्सीन उपलब्ध है, उसमें अप्रैल वाला आंकड़ा नहीं छुआ जा सकता.
सवाल यही है कि अप्रैल के मुकाबले मई में वैक्सीनेशन कम क्यों हुआ. अगर वैक्सीन कम थी, तब तो 18 प्लस के लिए वैक्सीनेशन खोल देना समस्या को दावत देने जैसा था. यहीं पर पारदर्शिता की जरूरत थी, जहां समस्या को स्वीकार किया जाता. बताया जाता कि यह समस्या है, जिसके साथ पूरे देश को साथ मिलकर जूझना है. वह नहीं हुआ. लेकिन यह तय है कि दूसरे लहर की अफरातफरी में जो हुआ, उसे किनारे रखकर सिर्फ कुल वैक्सीनेशन देखें, तो भारत को किसी से पीछे नहीं पाएंगे.
Tags:    

Similar News

-->