भूख का समाधान
इसमें दो राय नहीं कि किसी देश की तरक्की का एक पैमाना यह भी है
फाइल फोटो
जनता से रिश्ता वेबडेस्क | इसमें दो राय नहीं कि किसी देश की तरक्की का एक पैमाना यह भी है उसका कोई नागरिक भूखा न सोये। यह सत्ताधीशों की भी जवाबदेही है। लेकिन अच्छी स्थिति तो यह है कि हर हाथ को काम मिले और व्यक्ति को किसी राहत योजना का मोहताज न होना पड़े। भारत जैसे देश में जहां आर्थिक असमानता चरम पर है और जातिवादी दुराग्रहों से सामाजिक न्याय की अवधारणा सिरे नहीं चढ़ सकी, वहां परिस्थितियां कमजोर वर्ग को राहत की मांग करती हैं। फिर विभाजन, विस्थापन, प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं व महामारियों के चलते लाखों आबाद लोग सड़कों पर आ जाते हैं। साल-दर-साल आने वाली प्राकृतिक आपदाएं बाढ़, सूखा व अन्य प्रकोप गरीबों की संख्या में इजाफा करते हैं। यही वजह है कि अपने भरण-पोषण के दायित्व का निर्वहन न कर सकने वालों को सरकारी मदद की दरकार होती है। जो सरकारों की संवैधानिक बाध्यता भी है। कमोबेेश इसी दायित्व के निर्वहन हेतु देश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का क्रियान्वयन हुआ। खाद्य सुरक्षा योजना के तहत प्रत्येक निर्धन व्यक्ति को हर माह पांच किलो अनाज मुफ्त मुहैया कराने की व्यवस्था की गई। वहीं दूसरी ओर अत्यधिक निर्धन परिवारों के भरण-पोषण के लिये बनी अंत्योदय योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिवार को पैंतीस किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई। लेकिन जहां खाद्य सुरक्षा के तहत दिये जाने वाले अनाज के लिये प्रतीकात्मक कीमत देनी पड़ती थी, वहीं अंत्योदय योजना में दिये जाने वाला अनाज मुफ्त ही दिया जाता है। लेकिन देशव्यापी कोरोना संकट के बाद जब विषम परिस्थितियों के चलते व्यापक रोजगार संकट पैदा हुआ तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के जरिये भूख के संकट का समाधान निकालने का प्रयास किया गया। जिसका समय कालांतर बढ़ाया भी गया। अब सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना को विराम दे दिया है। लेकिन वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना और अंत्योदय योजना के तहत दिये जाने वाले अनाज के वितरण की समय सीमा में एक वर्ष की वृद्धि की गई है। जो मुफ्त मिलेगा।