छोटा पड़ेगा नया पैकेज
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था में आई जड़ता दूर करने और बाजार में नई मांग पैदा करने के लिए सोमवार को कई बड़े ऐलान किए।
मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री द्वारा घोषित पैकेजों से यह उम्मीद की जा सकती है कि इससे अर्थव्यवस्था को इतना जोरदार धक्का मिल पाएगा, जिससे यह स्टार्ट होकर अपनी गति पकड़ सके। अगर इसका जवाब उत्साहपूर्ण हां में देना मुश्किल हो रहा है तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इन घोषणाओं की धुरी केंद्र सरकार के कर्मचारियों तक सिमटी हुई है, जो आम उपभोक्ताओं का एक अत्यंत छोटा हिस्सा भर हैं। वित्त मंत्री ने यह उम्मीद जरूर जताई है कि केंद्र सरकार की ही तरह राज्य सरकारें और प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां भी अगर अपने कर्मचारियों को एलटीसी में वैसी ही छूट दें तो बाजार में काफी पैसा पहुंच जाएगा। मगर ऐसी छूट देने के लिए उन्हें प्रेरित करने वाले किसी ठोस कदम की घोषणा का अभी इंतजार ही है। एक अलग कदम के रूप में राज्य सरकारों के लिए 50 साल के लिए ब्याजरहित लोन के रूप में जो 12,000 करोड़ रुपये दिए जाने की घोषणा की गई है उसमें भी इतनी सारी कैटिगरी बनाते हुए ऐसी शर्तें जोड़ दी गई हैं कि किस राज्य के पास कितना पैसा पहुंचेगा, कहना मुश्किल है। 1000 करोड़ रुपये किसी के भी हाथ नहीं आने वाले, इतना तय जान पड़ता है।
इसमें दो राय नहीं कि मौजूदा हालात में सरकार के भी हाथ बंधे हुए हैं। महंगाई और राजकोषीय घाटे को काबू में रखने का दबाव उस पर है। ज्यादा खर्च करने के जोखिम को वह नजरअंदाज नहीं कर सकती। लेकिन इसके बरक्स खर्च न करने या जरूरत से कम खर्च करने का खतरा भी कम गंभीर नहीं है। फैक्ट्रियों में उत्पादन की स्थिति बताने वाले आईआईपी (इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रॉडक्शन) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक अगस्त महीने में इसमें पिछले साल के मुकाबले 8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। साफ है कि जुलाई महीने में दर्ज की गई 10.8 फीसदी की गिरावट के मुकाबले हालात कुछ खास नहीं सुधरे हैं। यही स्थिति कुछ महीने और बनी रही तो इकॉनमी को मंदी के दलदल में फंसने से बचाना मुश्किल होता जाएगा। जाहिर है, कारगर कदम उठाने के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं रह गया है।