सुधार की उम्मीद

जब देश की लोकसभा में करीब 43 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले घोषित रूप से दर्ज हों

Update: 2021-09-10 18:54 GMT

जब देश की लोकसभा में करीब 43 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले घोषित रूप से दर्ज हों, तब किसी भी पार्टी की ओर से आगे बढ़कर यह कहना स्वागतयोग्य है कि हम किसी माफिया या बाहुबली को चुनाव में नहीं उतारेंगे। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने शुक्रवार को कहा है कि उनकी पार्टी अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बाहुबलियों या माफिया उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारेगी। मायावती की इस घोषणा को जेल में बंद गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी और उनके भाई से जोड़कर अगर देखा जा रहा है, तो भी यह घोषणा अपने आप में उम्मीद जगाती है। ऐसे ही एक-एक दागी या अपराधी का टिकट कटना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि दुनिया को दिखाने के लिए बाहुबलियों का विरोध किया जाए और पिछले दरवाजे से उनको तरजीह मिलती रहे। दरअसल, यही होता आया है, कोई एक पार्टी अगर बाहुबलियों को बाहर का रास्ता दिखाती है, तो वे पहले से भी ज्यादा आक्रामकता के साथ किसी अन्य पार्टी के टिकट पर या किसी पार्टी के सहयोग से चुनाव जीतकर आ जाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ऐसे अनेक दागी हैं, जो दो से तीन दलों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं और उनके लिए लगभग हर पार्टी का दरवाजा कमोबेश खुला ही रहता है।

जरूरी है कि बसपा बाहुबलियों को टिकट न देने के अपने प्रयास में कामयाब हो, जिससे दूसरी पार्टियों को भी सबक मिले। हर पार्टी को यह समझना चाहिए कि लोग अपराधी किस्म के उम्मीदवारों को पसंद नहीं करते हैं, लेकिन किसी न किसी मजबूरी या भय की वजह से कहीं-कहीं बाहुबलियों का पलड़ा भारी हो जाता है। इतिहास गवाह है, जब-जब लोगों को मजबूत विकल्प मिला है, तब-तब बाहुबलियों को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी है। राजनीतिक पार्टी कोई भी हो, उसे अपने क्रिया-कलाप से यह दर्शाना चाहिए कि वह वाकई अपराध और अपराधियों के खिलाफ है। किसी भी पार्टी में योग्य लोगों की कमी नहीं है, तो फिर क्यों बाहुबलियों को आगे आने दिया जाए? जमाना बदल चुका है। जो बाहुबली है, उसकी खुलेआम चर्चा होती है, लोग पार्टियों के चरित्र को बार-बार परखते हैं और निराश होते हैं। अपने देश में पहले भी कुछ नेताओं से लोगों को उम्मीद रही है कि वे दागियों को टिकट नहीं देंगे, लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से जीते 39 प्रतिशत सांसद दागी थे, तो कांग्रेस की ओर से जीते 57 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। यह बात छिपी नहीं है कि अपराधियों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों की पालना भी सही ढंग से नहीं हो पाती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि राजनीतिक दलों में अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई और सुधार की इच्छाशक्ति का अभाव है। ऐसे में, बसपा की ओर से यह कहा जाना वाकई काबिलेगौर है कि कानून द्वारा, कानून का शासन सुनिश्चित करने के साथ-साथ, बसपा का संकल्प अब उत्तर प्रदेश की छवि को भी बदलना है। काश, ऐसा हो, तो उत्तर प्रदेश देश में राजनीतिक ताकत ही नहीं, बल्कि राजनीतिक चरित्र सुधार का भी नेतृत्व करता नजर आएगा। लोग भूल जाएंगे कि पहले किस पार्टी ने कितने दागी खडे़ किए थे, गलत उम्मीदवारों की छंटनी शुरू तो हो।


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