नियम यही है। जो किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता, उसे भी कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता। जिस दिन मैं अपने विचारों, शब्दों और कार्यों से पूरी तरह अहिंसक हो जाऊँगा, उस दिन मैं सभी समस्याओं से मुक्त हो जाऊँगा। आज भी मेरे जीवन में समस्याएँ हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि मैं अभी तक उस अहिंसक अवस्था तक नहीं पहुँच पाया हूँ। तो आइए, अभी से ही हानिकारक विचारों और हानिकारक वाणी को त्यागने का कार्य शुरू कर दूँ।
मैं क्या कर सकता हूँ? मेरे बोले गए अधिकांश शब्द या तो व्यर्थ होते हैं या फिर नुकसान पहुँचाने वाले। इसलिए, मैं यह आदत डाल लूँ कि कुछ भी बोलने से पहले थोड़ा रुकूँ और विचार करूँ कि जो मैं कहने जा रहा हूँ, क्या वह मौन रहने से बेहतर है? धीरे-धीरे मुझमें मौन की भावना विकसित होगी; और यही मौन मुझे अपने प्रियतम (ईश्वर) का नाम जपना सिखाएगा! और जैसे-जैसे मैं अपने हृदय की गहराइयों से उस दिव्य नाम का गान करूँगा, मेरी साँसें शुद्ध हो जाएँगी और मेरे विचार उन्नत हो जाएँगे।
यही वास्तव में एक आध्यात्मिक जीवन जीना है। यह रहस्यमयी मौन का जीवन है। यह समर्पण, पवित्रता और मौन त्याग का जीवन है। यह पूर्ण आत्म-समर्पण का जीवन है। यह ईश्वर द्वारा निर्देशित सच्चा जीवन है, जिसमें प्रभु हमारा मार्गदर्शन वैसे ही करते हैं, जैसे एक स्नेही माँ अपने छोटे बच्चों की रक्षा करती है और उन्हें सही राह दिखाती है। चाहे कष्ट आएँ! चाहे पीड़ा आए! हमारे आंतरिक सुकून को कोई विचलित नहीं कर सकता। हर परिस्थिति में—चाहे धूप हो या छाँव—वही हमारा मार्गदर्शन करते हैं; वही हमें एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक ले चलते हैं, जब तक कि हम उस पार (परम लक्ष्य) तक न पहुँच जाएँ।
(दादा जे. पी. वासवानी एक मानवतावादी, दार्शनिक, शिक्षाविद्, प्रतिष्ठित लेखक, प्रभावशाली वक्ता, अहिंसा के मसीहा और किसी संप्रदाय विशेष से न बंधे आध्यात्मिक गुरु थे।)
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