आरक्षण पर गतिरोध

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश में निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों के आरक्षण को रद्द कर दिया और साथ ही जल्द से जल्द चुनाव कराने को सरकार को निर्देशित किया है। इससे पिछड़े समाज के लोगों को बहुत आघात पहुंचा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जो अपने आप को पिछड़ों का हितैषी बताती है।

Update: 2022-12-31 06:16 GMT

Written by जनसत्ता; इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश में निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों के आरक्षण को रद्द कर दिया और साथ ही जल्द से जल्द चुनाव कराने को सरकार को निर्देशित किया है। इससे पिछड़े समाज के लोगों को बहुत आघात पहुंचा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जो अपने आप को पिछड़ों का हितैषी बताती है।

अदालत की दलील थी कि 'ट्रिपल टेस्ट' के बगैर पिछड़ों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इसके लिए सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना होगा। लेकिन सरकार ने 2017 निकाय चुनाव को आधार बनाकर अपना पक्ष रखा, जिसको अदालत ने खारिज कर दिया। सच यह है कि सरकार के ढुलमुल रवैए के कारण पिछड़ों को निकाय चुनाव के आरक्षण से हाथ धोना पड़ा।

पिछड़े समाज के लोगों द्वारा अपने बीच से तमाम मंत्री, विधायकों को अपने हक की लड़ाई के लिए विधानसभा में भेजा गया है। पर कोई मुंह खोलने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि सभी को सत्ता प्यारी है। सरकार शोषितों, वंचितों की बात करती है, लेकिन जब उनके हक की बात आती है तो आनाकानी करने लगती है। आरक्षण की विसंगति कोई नई बात नहीं है।

इससे पहले भी इस तरह की शिकायतें सामने आई थीं। जनता को और वंचितों के प्रति ईमानदार सरोकार रखने वाले तबकों को न्याय के पक्ष में अपना पक्ष मुखर होकर व्यक्त करना चाहिए। सरकार को अपनी ओर से वंचित वर्गों के हक में आरक्षण को लागू कराने के लिए कदम उठाना चाहिए, ताकि हाशिए के वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित हो। 'सबका साथ सबका विकास' नारा तभी सार्थक होगा।


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