उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए आठ नए चेहरों को उतारने के भाजपा के फैसले को केवल उच्च सदन में खाली सीटों को भरने की एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों की राजनीतिक लड़ाई के लिए एक शुरुआती कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। इस सूची से पार्टी की प्राथमिकताएं साफ झलकती हैं: जाति, क्षेत्र, लिंग और संगठन के प्रति निष्ठा—इन सभी को एक चुनावी रणनीति में शामिल किया गया है।
भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनावों में मिले झटके से एक अहम सबक सीखा है। 2019 में राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 62 जीतने वाली भाजपा, 2024 में घटकर 33 सीटों पर आ गई। इस हार ने उस सामाजिक गठबंधन की कमजोरियों को उजागर कर दिया, जिसने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को शानदार जीत दिलाई थी। राज्यसभा के लिए किए गए ये नामांकन बताते हैं कि मतदाताओं के फिर से वोट डालने जाने से काफी पहले ही, पार्टी उस गठबंधन को दुरुस्त करने की कोशिश कर रही है।
जातीय समीकरणों के आधार पर चयन
इस सूची की सबसे खास बात जातीय संतुलन को बहुत सोच-समझकर साधना है। तीन उम्मीदवार ओबीसी समुदाय से हैं, दो दलित हैं, और तीन सवर्ण जातियों से आते हैं। लेकिन इस मोटे वर्गीकरण के पीछे एक गहरी चुनावी रणनीति छिपी है। ओबीसी उम्मीदवारों में लोध, पाल और कुर्मी समुदायों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। ये समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन अब समाजवादी पार्टी अपनी 'पीडीए' (PDA) रणनीति के तहत इन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।
इस संदर्भ में, राज्य भाजपा ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष प्रकाश पाल का चयन काफी अहम है। उन्हें आगे लाने का मतलब यह है कि भाजपा, पिछड़े वर्गों से जुड़े राजनीतिक विमर्श पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार नहीं होने देना चाहती। धर्मपाल सिंह का चयन लोध समुदाय के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने के लिए है, जबकि श्रुति गंगवार के जरिए पार्टी रुहेलखंड के कुर्मी-बहुल इलाके में अपनी पहुंच बढ़ा रही है।
दलित उम्मीदवारों का चयन भी पूरी तरह से राजनीतिक है। विद्यासागर सोनकर अपने साथ संगठन के पुराने अनुभव और पूर्वांचल से जुड़ाव लेकर आते हैं, जबकि प्रियंका सिंह रावत दलित प्रतिनिधित्व के साथ-साथ महिला प्रतिनिधित्व का भी संतुलन बनाती हैं। पासी समुदाय, जिससे रावत आते हैं, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में चुनावी दृष्टि से काफी अहम है।
उच्च जातियों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है। राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडे के जरिए ब्राह्मणों को, और राम प्रताप सिंह चौहान के जरिए राजपूतों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इससे पता चलता है कि बीजेपी उन समुदायों का समर्थन बनाए रखने के प्रति सचेत है, जो पारंपरिक रूप से उसके राजनीतिक आधार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो, यह सूची उत्तर प्रदेश के जटिल चुनावी समीकरणों के लगभग हर पहलू को साधने की कोशिश करती है। इसमें ओबीसी, दलित, उच्च जातियां, महिलाएं, अलग-अलग क्षेत्र और पार्टी संगठन—सभी को प्रतिनिधित्व मिला है।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक नवीनीकरण
क्षेत्रीय विस्तार भी काफी कुछ बयां करता है। इसमें रुहेलखंड, अवध, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, कानपुर-बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे क्षेत्र शामिल हैं। यह कोई संयोग नहीं है। उत्तर प्रदेश को एक एकल चुनावी क्षेत्र नहीं माना जा सकता। पश्चिमी यूपी से लेकर पूर्वांचल तक, और रुहेलखंड से लेकर बुंदेलखंड तक, सामाजिक समीकरण पूरी तरह बदल जाते हैं। ऐसा लगता है कि बीजेपी ने यह समझ लिया है कि 2027 में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए उसे क्षेत्र-विशेष और जाति-विशेष, दोनों तरह की रणनीतियों की जरूरत होगी।
इस सूची में एक और राजनीतिक संदेश है, जो शायद और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है: निरंतरता की जगह अब नवीनीकरण ने ले ली है। बीजेपी के जो राज्यसभा सदस्य अपना कार्यकाल पूरा कर रहे हैं, उनमें से किसी को भी दोबारा मौका नहीं दिया गया है। हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, नीरज शेखर, बृज लाल, बीएल वर्मा, गीता शाक्य और सीमा द्विवेदी जैसे स्थापित चेहरों की जगह अब नए चेहरों को दी गई है।
यह फैसला काफी अहम है, क्योंकि पारंपरिक रूप से बीजेपी राजनीतिक परिस्थितियों की मांग होने पर अनुभवी संसदीय चेहरों को बनाए रखने में सहज रही है। लेकिन इस बार पार्टी ने अलग रास्ता चुना है। नीरज शेखर बीजेपी की ओर से अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे थे, जबकि अरुण सिंह भी अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहे थे। बृज लाल 2020 में उच्च सदन में आए थे और अब अपना पहला कार्यकाल पूरा कर रहे थे। पार्टी की उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और स्थापित चेहरा, बीएल वर्मा को भी दोबारा मौका नहीं दिया गया है।
इस बड़े बदलाव से संकेत मिलता है कि राज्यसभा के नामांकन का इस्तेमाल राजनीतिक पुनर्गठन के एक साधन के रूप में किया जा रहा है। बीजेपी केवल वरिष्ठता को ही पुरस्कृत नहीं कर रही है; बल्कि वह राज्य-स्तरीय राजनीतिक नेतृत्व की एक ऐसी नई परत तैयार करने की कोशिश कर रही है, जो 2027 के चुनाव अभियान में पार्टी के चुनावी संदेश को आगे ले जा सके।
संगठनात्मक निष्ठा और चुनावी जोखिम
यह पार्टी कार्यकर्ताओं (कैडर) के लिए भी एक संदेश है। कई उम्मीदवारों ने संसद या सरकार के माध्यम से अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के बजाय, संगठन के भीतर काम करते हुए वर्षों बिताए हैं। उन्हें आगे बढ़ाना बीजेपी के उस पुराने तर्क को और मजबूत करता है कि संगठनात्मक कार्यों का फल अंततः राजनीतिक पदों या सम्मान के रूप में मिल सकता है। ऐसे समय में जब अक्सर राजनीतिक दलों पर मशहूर हस्तियों, दूसरे दलों से आए नेताओं और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों पर निर्भर रहने का आरोप लगता है, बीजेपी ने अपने कैडर नेटवर्क के महत्व को रेखांकित करने का विकल्प चुना है।
फिर भी, इस रणनीति के अपने जोखिम हैं। सोशल इंजीनियरिंग का मतलब सिर्फ अलग-अलग जातियों में टिकट बांटना नहीं है। बीजेपी को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन प्रतीकात्मक फैसलों से संगठन में सक्रियता बढ़े और वोट मिलें। राज्यसभा में किसी को नामित करने से किसी समुदाय के बीच अच्छी छवि तो बन सकती है, लेकिन इससे स्थानीय स्तर पर सत्ता-विरोधी लहर, बेरोजगारी की चिंता, ग्रामीण संकट या मतदाताओं के कुछ वर्गों की नाराजगी दूर नहीं हो सकती।
समाजवादी पार्टी भी बीजेपी की इस 'जातीय संतुलन' की रणनीति को इस तरह पेश करने की कोशिश करेगी कि बीजेपी का पुराना सामाजिक गठबंधन कमजोर हो गया है। अखिलेश यादव की 'PDA' राजनीति ने बीजेपी को गैर-यादव OBC और दलितों पर ज्यादा ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया है। बीजेपी का मकसद मुख्य रूप से यह है कि विपक्ष जातीय प्रतिनिधित्व को एक बड़े राजनीतिक बदलाव में न बदल पाए।
2027 की लड़ाई शुरू हो चुकी है
इसका बड़ा संदेश साफ है। 2024 के झटके के बाद, बीजेपी उसी राजनीतिक फॉर्मूले की ओर लौट रही है जो 2017 और 2022 में उसके लिए कारगर रहा था, लेकिन इसमें कुछ बदलाव भी किए गए हैं। पार्टी अपने सवर्ण आधार को बनाए हुए है, गैर-यादव OBC नेटवर्क को मजबूत कर रही है, दलित समुदायों के बीच अपनी पैठ गहरी कर रही है, महिलाओं को ज्यादा अहमियत दे रही है और संगठन के कार्यकर्ताओं को पुरस्कृत कर रही है।
क्या यह सोच-समझकर तैयार किया गया 'गणित' एक बार फिर चुनावी 'केमिस्ट्री' (सफलता) में बदल पाएगा? यही असली परीक्षा होगी। लेकिन राज्यसभा के लिए बीजेपी के चयन से एक बात साफ है: पार्टी के लिए 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव अब कोई दूर की बात नहीं है। यह लड़ाई पहले ही शुरू हो चुकी है।
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