टाले जा सकने वाले मुकदमे अदालत की राह में बाधा बन रहे हैं
टाले जा सकने वाले मुकदमे अदालत
किसी व्यक्ति के अनुसूचित जाति (SC) दर्जे को तय करने के लिए ज़िला सतर्कता समिति (DVC) का उसकी शारीरिक बनावट पर निर्भर रहना और मद्रास हाईकोर्ट द्वारा इस साफ़ तौर पर गलत तरीके को खारिज करना, अदालतों में बेवजह मुकदमों के बोझ का एक बेहतरीन उदाहरण है।
यह मामला एक सरकारी अधिकारी का है, जिसके रिटायरमेंट के समय उसके SC सर्टिफिकेट की ज़िला सतर्कता समिति (DVC) द्वारा जांच की गई। समिति ने यह नतीजा निकाला कि उस व्यक्ति की लंबी कद-काठी, गोरा रंग, घुंघराले बाल और अंग्रेज़ी व तमिल भाषाओं में अच्छी पकड़ के कारण उसके जाति के दावे पर यकीन करना मुश्किल है।
समिति के इस फैसले के खिलाफ कानूनी चुनौती दी गई और हाईकोर्ट ने फैसला लेने के लिए बिना सबूत वाली बातों पर निर्भर रहने के लिए समिति की आलोचना की। DVC के इस तरह काम करने का कोई ठोस कारण नहीं था, क्योंकि किसी व्यक्ति के SC दर्जे को तय करने के लिए संविधान और अदालती निर्देशों में पूरी स्पष्टता है। यहाँ तक कि अगर किसी ने ईसाई धर्म जैसे किसी दूसरे धर्म को अपना लिया हो और फिर हिंदू धर्म में वापसी की हो—जो कि एक अहम पहलू है क्योंकि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध ही SC दर्जे के हकदार हैं—तो भी इसके लिए स्पष्ट नियम हैं: पुराने समुदाय का सदस्य होने का सबूत, पुराने SC समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाना, और उस धर्म को पूरी तरह छोड़ देना जिसे सदस्य ने अपनाया था। शादी के ज़रिए SC दर्जा हासिल करना भी मुमकिन नहीं है।
कानूनी स्थिति को देखते हुए, DVC के पास गुमराह होने और जाति का दर्जा तय करने के लिए ऐसी सतही बातों पर निर्भर रहने का कोई कारण नहीं है जिनका कोई ठोस आधार नहीं है और जिनमें मानव-विज्ञान संबंधी मूल्यांकन की कमी है।
पूरी सावधानी और बुनियादी कानूनी समझ के साथ, DVC बेवजह के मुकदमों से बच सकती थी। इसके अलावा, अदालत ने समिति के निष्कर्षों के कुछ पहलुओं को तो सही माना लेकिन उनमें सबूतों की कमी पाई। अब मामले को समिति के पास वापस भेज दिया गया है ताकि वह नए सबूतों—जैसे कि उस व्यक्ति की पुरानी तस्वीरें जिन्हें वह पेश कर सकता है—के आधार पर फिर से विचार कर सके। जाति तय करना एक प्रशासनिक काम है जिसे खास समितियाँ करती हैं और संविधान के अनुसार यह पूरी तरह से जन्म पर आधारित होता है।
ऐसी जांच समितियों की कोशिश होनी चाहिए कि वे सावधानी से काम करें और जन्म, स्कूली शिक्षा और समुदाय के कार्यक्रमों से जुड़े ज़रूरी दस्तावेज़ों की जांच करें, ताकि ऊपरी अदालतों पर ऐसे नए मुकदमों का बोझ न पड़े जिनका फैसला कानून और पहले के फैसलों के आधार पर आसानी से किया जा सकता है। फिर भी, दूसरी तरफ़ सिस्टम पर दबाव भी बढ़ रहा है क्योंकि आज सरकारी नौकरियों में कमी आ रही है और औपचारिक रोज़गार के मौके कम हो रहे हैं।
इस मामले में, उम्मीदवार इस साल मई में रिटायर हो गया। जाति तय करने से जुड़ी प्रक्रियात्मक गलतियों के अलावा, एक ऐसे वर्कफोर्स (कामकाजी माहौल) को बनाने की कोशिश का सवाल भी है जहाँ अलग-अलग बैकग्राउंड के लोग आपस में घुल-मिल सकें। सबसे ज़्यादा आबादी वाले देश में, कोशिश औपचारिक नौकरियों को बढ़ाने की होनी चाहिए, जिससे जाति और समुदाय के आधार पर असमानताएँ कम हों। दुर्भाग्य से, 'प्रीकेरिएट' (अस्थिर और असुरक्षित काम करने वाले लोग) की संख्या बढ़ रही है, जिससे उन कुछ औपचारिक नौकरियों पर दबाव बढ़ रहा है जहाँ आरक्षण व्यवस्था अभी भी मायने रखती है।