दिल्ली : भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम तेजस Mk-2 को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय वायुसेना के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने रिटायरमेंट के बाद इस परियोजना की गति, समयसीमा और भविष्य की तैयारियों को लेकर चिंता जताई है। उनके सवालों ने रक्षा क्षेत्र में एक नई बहस शुरू कर दी है कि क्या भारत अपने लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रमों को तय समय पर पूरा कर पाएगा।
तेजस Mk-2 को भारतीय वायुसेना के लिए एक महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान परियोजना माना जा रहा है। यह मौजूदा तेजस Mk-1 के मुकाबले ज्यादा क्षमता वाला मध्यम वजन का लड़ाकू विमान है, जिसे भविष्य में पुराने लड़ाकू विमानों की जगह लेने के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है। इसमें अधिक शक्तिशाली इंजन, बेहतर हथियार क्षमता, आधुनिक एवियोनिक्स और ज्यादा रेंज जैसी खूबियां शामिल करने की योजना है।
रिटायरमेंट के बाद क्यों उठे सवाल?
पूर्व डिप्टी एयर चीफ मार्शल का कहना है कि किसी भी स्वदेशी रक्षा परियोजना की सफलता केवल डिजाइन बनाने से नहीं बल्कि समय पर उत्पादन और सेना को विमान उपलब्ध कराने से तय होती है। उन्होंने तेजस Mk-2 की समयसीमा और निर्माण प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है।
उनका मानना है कि आधुनिक युद्ध की परिस्थितियों को देखते हुए वायुसेना को तेजी से नए लड़ाकू विमानों की जरूरत है। अगर स्वदेशी परियोजनाओं में देरी होती है तो इसका असर वायुसेना की ताकत और भविष्य की रणनीति पर पड़ सकता है।
तेजस Mk-2 क्यों है महत्वपूर्ण?
तेजस Mk-2 को भारत के लिए केवल एक विमान नहीं बल्कि आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह विमान विदेशी लड़ाकू विमानों पर निर्भरता कम करने की कोशिश का हिस्सा है।
इस विमान को 4.5 पीढ़ी का मल्टीरोल फाइटर माना जा रहा है। इसमें दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने, हवाई सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण मिशनों को अंजाम देने की क्षमता विकसित करने की योजना है।
देरी को लेकर पहले भी उठे हैं सवाल
तेजस कार्यक्रम से जुड़े प्रोजेक्ट्स में समयसीमा को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। भारतीय वायुसेना ने कई बार रक्षा उत्पादन एजेंसियों से तय समय पर विमान उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया है। खासकर इंजन और उत्पादन क्षमता से जुड़ी चुनौतियों को लेकर चर्चा होती रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लड़ाकू विमान निर्माण एक बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसमें डिजाइन, परीक्षण, इंजन, हथियार प्रणाली, रडार और सुरक्षा मानकों को पूरा करना पड़ता है। किसी भी एक हिस्से में देरी होने से पूरी परियोजना प्रभावित हो सकती है।
इंजन और तकनीक बड़ी चुनौती
तेजस Mk-2 परियोजना में इंजन को सबसे अहम हिस्सों में से एक माना जाता है। इसमें अमेरिकी GE F414 इंजन के इस्तेमाल की योजना है। इंजन आपूर्ति और तकनीकी सहयोग से जुड़े मुद्दे परियोजना की गति को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके अलावा आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और हथियारों का एकीकरण भी महत्वपूर्ण चरण हैं। विमान को वायुसेना की जरूरतों के अनुसार तैयार करने के लिए कई स्तरों पर परीक्षण किए जाते हैं।
वायुसेना की जरूरत और लड़ाकू बेड़े की चुनौती
भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने और पुराने विमानों को बदलने की जरूरत महसूस कर रही है। ऐसे में स्वदेशी तेजस Mk-2 जैसे प्रोजेक्ट बेहद अहम हो जाते हैं।
वायुसेना चाहती है कि उसे समय पर आधुनिक और भरोसेमंद लड़ाकू विमान मिलें, ताकि भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों का सामना किया जा सके।
क्या है सरकार और निर्माता की योजना?
रक्षा क्षेत्र में भारत लगातार स्वदेशी उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है। तेजस Mk-2 के अलावा एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) जैसी परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है।
निर्माता और विकास एजेंसियां लगातार दावा करती रही हैं कि परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है और आने वाले समय में इसका परीक्षण व उत्पादन चरण पूरा किया जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, तेजस Mk-2 भारत की रणनीतिक जरूरतों से जुड़ा प्रोजेक्ट है। इसमें देरी से बचने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाना, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना और तकनीकी चुनौतियों को तेजी से हल करना जरूरी है।
उनका कहना है कि आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण के लिए केवल परियोजनाएं शुरू करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समय पर पूरा करना भी उतना ही जरूरी है।
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