नई दिल्ली। देश में बढ़ते तापमान, तेजी से फैलते शहरीकरण और एयर कंडीशनर तथा रेफ्रिजरेटर के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कूलिंग की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है कि लोगों को ठंडक उपलब्ध कराने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को भी कम किया जाए। इसी दिशा में कम ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) वाले रेफ्रिजरेंट्स को अपनाने की जरूरत बढ़ रही है। भारत ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) के इस्तेमाल को धीरे-धीरे कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता भी जताई है। इसके तहत 2028 को HFC की खपत स्थिर करने का वर्ष निर्धारित किया गया है।

कूलिंग की जरूरत केवल घरों में एयर कंडीशनर चलाने तक सीमित नहीं है। खाद्य पदार्थों के भंडारण, कोल्ड चेन, औद्योगिक प्रक्रियाओं और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में भी रेफ्रिजरेशन की अहम भूमिका है। ऐसे में भारत को ऐसी तकनीक और रेफ्रिजरेंट्स अपनाने होंगे, जो ठंडक की जरूरत पूरी करने के साथ जलवायु पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने में मदद करें।

HFC ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन बढ़ाते हैं ग्लोबल वार्मिंग

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यानी HFC का इस्तेमाल एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और दूसरे कूलिंग उपकरणों में किया जाता है। इन्हें पहले इस्तेमाल होने वाले कुछ ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के विकल्प के रूप में अपनाया गया था। HFC की खास बात यह है कि ये समताप मंडल की ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन कई HFC का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल काफी अधिक होता है।

GWP किसी गैस की उस क्षमता को दर्शाता है, जिसके जरिए एक निर्धारित अवधि में उसके वातावरण को गर्म करने वाले प्रभाव की तुलना कार्बन डाइऑक्साइड से की जाती है। जिन रेफ्रिजरेंट्स का GWP अधिक होता है, उनके वातावरण में उत्सर्जित होने से जलवायु परिवर्तन पर ज्यादा असर पड़ सकता है।

यही वजह है कि अब केवल ओजोन परत को सुरक्षित रखने पर ही नहीं, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कूलिंग उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले रेफ्रिजरेंट्स का चयन इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किगाली संशोधन के तहत भारत की प्रतिबद्धता

भारत ने वर्ष 2021 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के किगाली संशोधन को मंजूरी दी थी। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत HFC के उत्पादन और खपत को धीरे-धीरे कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य ऐसी गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है, जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाए बिना भी ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देती हैं।

भारत के लिए HFC की खपत स्थिर करने का वर्ष 2028 निर्धारित है। इसके बाद तय कार्यक्रम के अनुसार HFC की खपत में चरणबद्ध कमी की जाएगी। भारत के लिए यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में कूलिंग की मांग बढ़ने के साथ रेफ्रिजरेंट्स की जरूरत भी बढ़ रही है।

इस बदलाव का मकसद कूलिंग क्षेत्र की वृद्धि को अचानक रोकना नहीं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देते हुए उत्सर्जन कम करना है। इसके लिए उद्योगों को नई तकनीक अपनाने, उपकरणों में बदलाव करने और वैकल्पिक रेफ्रिजरेंट्स के इस्तेमाल की तैयारी करनी होगी।

2032 से शुरू होगी HFC खपत में चरणबद्ध कटौती

भारत के लिए निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 2032 से HFC की खपत में चरणबद्ध कमी शुरू होगी। सरकारी जानकारी के मुताबिक, तय कार्यक्रम के प्रमुख पड़ाव इस प्रकार हैं:

- 2028: HFC खपत को निर्धारित आधार स्तर पर स्थिर करना।

- 2032: आधार स्तर से 10 प्रतिशत की संचयी कमी।

- 2037: 20 प्रतिशत की संचयी कमी।

- 2042: 30 प्रतिशत की संचयी कमी।

- 2047: 85 प्रतिशत की संचयी कमी।

ये लक्ष्य HFC की निर्धारित आधार खपत के संदर्भ में हैं। इनके लिए उद्योगों को उपलब्ध तकनीक, वैकल्पिक रेफ्रिजरेंट्स और आवश्यक निवेश के अनुसार बदलाव करने होंगे।

कम-GWP वाले विकल्प अपनाने की जरूरत

HFC के विकल्प के रूप में कम GWP वाले रेफ्रिजरेंट्स और नई कूलिंग तकनीकों पर ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि, किसी विकल्प का चयन केवल उसके कम GWP के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसे उपकरण की कार्यक्षमता, ऊर्जा खपत, सुरक्षा, लागत और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप भी होना चाहिए।

कुछ विकल्पों में ज्वलनशीलता या अन्य सुरक्षा संबंधी चुनौतियां हो सकती हैं। इसलिए उपकरण निर्माताओं, तकनीशियनों और सेवा प्रदाताओं को उचित मानकों तथा प्रशिक्षण के अनुसार काम करना जरूरी होगा।

भारत सरकार की इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान जैसी पहलें कूलिंग की मांग घटाने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और कम GWP वाले विकल्पों को बढ़ावा देने पर ध्यान देती हैं। भवनों में बेहतर डिजाइन, पैसिव कूलिंग, ऊर्जा दक्ष उपकरण और रेफ्रिजरेंट्स के सही इस्तेमाल से पर्यावरणीय प्रभाव कम करने में मदद मिल सकती है।

उद्योग और उपभोक्ताओं के सामने नई चुनौतियां

HFC से कम-GWP वाले विकल्पों की ओर बदलाव के लिए उपकरण निर्माताओं, रेफ्रिजरेंट उत्पादकों और मरम्मत तथा रखरखाव से जुड़े तकनीशियनों को तैयार रहना होगा। पुराने उपकरणों की सर्विसिंग के दौरान रेफ्रिजरेंट के रिसाव को रोकना और उसे सुरक्षित तरीके से संभालना भी महत्वपूर्ण होगा।

उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा दक्ष उपकरण चुनना और उनकी नियमित देखभाल करना उपयोगी हो सकता है। वहीं, उद्योगों को उत्पादन प्रक्रियाओं में बदलाव और नए उपकरणों के विकास के लिए निवेश की जरूरत पड़ सकती है।

भारत की चुनौती यह है कि बढ़ती कूलिंग मांग को पूरा करते हुए ऊर्जा की खपत और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण रखा जाए। इसके लिए पर्यावरण के अनुकूल रेफ्रिजरेंट्स के साथ ऊर्जा दक्षता और सुरक्षित तकनीकों को भी समान महत्व देना होगा।

कुल मिलाकर, भारत में 2028 HFC खपत स्थिर करने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसके बाद 2032 से चरणबद्ध कटौती का कार्यक्रम लागू होगा। बढ़ती कूलिंग जरूरतों और जलवायु लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने के लिए कम-GWP वाले रेफ्रिजरेंट्स, बेहतर उपकरणों और ऊर्जा दक्ष तकनीकों को अपनाना अहम रहेगा।

Tags: