नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीटों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण की रोटेशन व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि विधानसभा और लोकसभा की आरक्षित सीटों में समय-समय पर बदलाव करने का निर्णय संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत इस संबंध में कानून बनाने के लिए संसद को निर्देश नहीं दे सकती। इस फैसले के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की संबंधित व्यवस्था को संवैधानिक रूप से वैध माना गया था।मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटें दशकों से अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों पर लंबे समय तक एक ही प्रकार का आरक्षण बने रहने से दूसरे वर्गों के संभावित उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिल पाता।याचिकाकर्ता का कहना था कि पंचायतों और नगर निकायों की तरह विधानसभा तथा लोकसभा की आरक्षित सीटों में भी रोटेशन की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे आरक्षण का लाभ अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में पहुंच सकेगा और चुनावी प्रतिनिधित्व अधिक व्यापक हो सकेगा।
सुल्तानपुर की कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा मामला
यह विवाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की कादीपुर विधानसभा सीट से संबंधित है। याचिकाकर्ता जगदीश सिंह इसी निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता हैं। उनका तर्क था कि कादीपुर विधानसभा सीट वर्ष 1952 से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रही है। लगभग सात दशकों से आरक्षण की स्थिति में बदलाव नहीं होने के कारण सामान्य वर्ग के उम्मीदवार इस सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते।याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष सवाल उठाया कि क्या किसी निर्वाचन क्षेत्र को लगातार कई दशकों तक आरक्षित बनाए रखना उचित है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनाई गई है, लेकिन इसमें समय-समय पर बदलाव की गुंजाइश भी होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण किस आधार पर किया जाए, यह विधायी नीति से जुड़ा प्रश्न है। यदि किसी व्यक्ति को मौजूदा व्यवस्था से आपत्ति है, तो वह संसद के समक्ष अपनी मांग रख सकता है।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि रोटेशन की व्यवस्था लागू कराने के लिए याचिकाकर्ता को उचित विधायी मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए। न्यायालय का काम मौजूदा कानून की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करना है। किसी वैकल्पिक नीति को बेहतर मानने के आधार पर अदालत संसद को नया कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय के मतदाता हमेशा अपनी ही जाति या समुदाय के उम्मीदवार को मतदान करेंगे। मतदाताओं के व्यवहार को केवल जातीय आधार पर निर्धारित मानना सही नहीं है।पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी कानून के तहत अपनाए गए मानदंड से असहमति अपने आप में उस कानून को असंवैधानिक घोषित करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकती।
परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(सी) को चुनौती
याचिका में परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। इस प्रावधान के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण संबंधित समुदाय की आबादी के अनुपात को ध्यान में रखकर किया जाता है।अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों का चयन उन क्षेत्रों में किया जाता है, जहां इस समुदाय की आबादी का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक हो। अनुसूचित जनजाति के लिए भी कानून में आबादी से जुड़े मानदंड निर्धारित हैं।याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस व्यवस्था के कारण कुछ निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय तक आरक्षित बने रहते हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों को कभी आरक्षण के दायरे में आने का अवसर नहीं मिलता।हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था को बदलने के लिए विधायी पहल आवश्यक है। अदालत ने धारा 9(1)(सी) को चुनौती देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही खारिज कर चुका था याचिका
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 22 जून 2026 को जगदीश सिंह की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन की व्यवस्था सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को व्यापक बनाने का एक विकल्प हो सकती है।हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसी व्यवस्था लागू करना संसद का विशेषाधिकार है। न्यायपालिका किसी कानून में संशोधन करने या नई व्यवस्था बनाने का आदेश नहीं दे सकती।हाईकोर्ट ने परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(सी) को संवैधानिक रूप से वैध माना था। इसी फैसले को याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पंचायत और विधानसभा चुनावों के आरक्षण में अंतर
भारत में पंचायतों और नगर निकायों के चुनावों में आरक्षित सीटों के रोटेशन का प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी के तहत स्थानीय निकायों में आरक्षण संबंधी व्यवस्थाएं निर्धारित की गई हैं।याचिकाकर्ता चाहते थे कि इसी तरह का प्रावधान विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी लागू किया जाए।हालांकि, लोकसभा और विधानसभा में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 से संबंधित है। मौजूदा संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था में प्रत्येक चुनाव के बाद आरक्षित संसदीय तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का अनिवार्य रोटेशन करने का प्रावधान नहीं है।
उत्तर प्रदेश की 85 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। इनमें 85 सीटें अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों का निर्धारण जनसंख्या और परिसीमन संबंधी कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया गया है।याचिकाकर्ता ने इन सीटों के निर्धारण में बदलाव की मांग उठाई थी। उनका कहना था कि रोटेशन लागू होने से अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के उम्मीदवारों को प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सकता है।इस मामले ने चुनावी प्रतिनिधित्व और आरक्षण व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल खड़ा किया।
संसद के पास रहेगा बदलाव का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल लोकसभा और विधानसभा की SC-ST आरक्षित सीटों में अनिवार्य रोटेशन लागू करने का रास्ता न्यायिक आदेश के माध्यम से नहीं खुलेगा।हालांकि, अदालत ने यह नहीं कहा कि भविष्य में रोटेशन की व्यवस्था बनाई ही नहीं जा सकती। न्यायालय का निष्कर्ष यह है कि इस विषय पर निर्णय लेने और आवश्यक कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है।इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था की वैधानिक स्थिति बरकरार रखते हुए स्पष्ट कर दिया है कि चुनावी आरक्षण की नीति में बदलाव के लिए विधायी प्रक्रिया अपनाना आवश्यक होगा।
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