नई दिल्ली। नेशनल हेराल्ड से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई की कानूनी बुनियाद पर सवाल उठाए हैं। दोनों नेताओं ने अपने जवाब में तर्क दिया है कि ED की मनी लॉन्ड्रिंग कार्यवाही किसी पुलिस FIR पर आधारित नहीं थी, बल्कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से दायर एक निजी शिकायत और उस पर मजिस्ट्रेट के संज्ञान से शुरू हुई थी। उनका कहना है कि ऐसी निजी शिकायत को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत मनी लॉन्ड्रिंग मामले की वैध बुनियाद नहीं माना जा सकता। इस कानूनी प्रश्न पर अब दिल्ली हाई कोर्ट को फैसला करना है।सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने 18 सितंबर 2026 को अलग-अलग लेकिन काफी हद तक समान जवाब दाखिल किए। यह जवाब ED की उस याचिका के विरोध में हैं जिसमें एजेंसी ने राउज एवेन्यू कोर्ट के 16 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी है। निचली अदालत ने ED की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था।
PMLA में निजी शिकायत का प्रावधान नहीं होने का तर्क
सोनिया और राहुल गांधी की ओर से मुख्य दलील यह है कि PMLA की व्यवस्था किसी अनुसूचित यानी प्रेडिकेट अपराध से उत्पन्न कथित अपराध की आय से जुड़ी होती है। उनके जवाब के मुताबिक इस मामले में ED ने जिस आधार पर जांच शुरू की, वह किसी पुलिस एजेंसी द्वारा दर्ज FIR नहीं बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी की निजी आपराधिक शिकायत थी।उन्होंने तर्क दिया है कि PMLA में “प्राइवेट शिकायत” को उस तरह की बुनियाद के रूप में मान्यता नहीं दी गई है जिस पर ED स्वतंत्र रूप से मनी लॉन्ड्रिंग की कार्यवाही शुरू कर सके। यह गांधी परिवार का कानूनी पक्ष है और ED इससे असहमत है; इसी विवाद पर हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है।
2012 में दायर हुई थी स्वामी की शिकायत
नेशनल हेराल्ड विवाद की शुरुआत सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत से हुई थी। उपलब्ध अदालती और मीडिया रिकॉर्ड के अनुसार स्वामी ने 2012 में दिल्ली की अदालत में शिकायत दाखिल की थी। इसलिए इसे 2013 की शिकायत बताना सटीक नहीं है। शिकायत में Associated Journals Limited (AJL), Young Indian और कांग्रेस नेताओं से जुड़े लेनदेन को लेकर कथित धोखाधड़ी और संपत्ति से संबंधित आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों का गांधी परिवार और कांग्रेस लंबे समय से विरोध करते रहे हैं।AJL नेशनल हेराल्ड अखबार की प्रकाशक कंपनी है। मामले में Young Indian की ओर से AJL से संबंधित वित्तीय व्यवस्था और शेयरहोल्डिंग को लेकर सवाल उठाए गए। ED ने बाद में इन्हीं लेनदेन से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग की जांच की।
निचली अदालत ने ED की शिकायत पर नहीं लिया था संज्ञान
दिसंबर 2025 में विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने ED की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। अदालत का निष्कर्ष था कि ED की शिकायत उस समय किसी FIR पर आधारित नहीं थी बल्कि सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश पर आधारित थी। अदालत ने इसे PMLA के तहत संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं माना।यह आदेश सोनिया गांधी या राहुल गांधी को आरोपों से बरी करने वाला फैसला नहीं था। इसका मुख्य विषय यह था कि ED की अभियोजन शिकायत पर उस प्रक्रिया के आधार पर संज्ञान लिया जा सकता है या नहीं।इसी आदेश को ED ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है।
ED ने हाई कोर्ट का किया रुख
ED का कहना है कि निचली अदालत ने कानून की गलत व्याख्या की और उसकी अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लिया जाना चाहिए था। दिसंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य संबंधित पक्षों को ED की याचिका पर नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। बाद में जुलाई 2026 में अदालत ने उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया।मामले में ED ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य लोगों पर साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए हैं। एजेंसी का आरोप है कि Young Indian से जुड़े लेनदेन के जरिए AJL की करीब 2,000 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल किया गया। ये ED के आरोप हैं और संबंधित पक्ष इनका विरोध करते रहे हैं।
गांधी परिवार ने बताया असामान्य मामला
अपने जवाब में सोनिया और राहुल गांधी ने दावा किया है कि निजी नागरिक की शिकायत को आधार बनाकर PMLA कार्रवाई शुरू करने का यह मामला असामान्य है। उनका तर्क है कि यदि किसी कथित अनुसूचित अपराध की जांच पुलिस या किसी अधिकृत जांच एजेंसी ने FIR के माध्यम से शुरू नहीं की थी, तो ED उसके आधार पर स्वतंत्र रूप से मनी लॉन्ड्रिंग की अभियोजन कार्यवाही आगे नहीं बढ़ा सकती।यह वही मूल कानूनी मुद्दा है जिस पर निचली अदालत का दिसंबर 2025 का आदेश केंद्रित था।
बाद में दर्ज हुई अलग FIR
इस मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी है कि अक्टूबर 2025 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने ED की शिकायत पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य लोगों के खिलाफ अलग FIR दर्ज की थी। रिपोर्टों के अनुसार इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और कथित संपत्ति हड़पने जैसे आरोप शामिल किए गए।हालांकि दिसंबर 2025 में निचली अदालत के सामने सवाल यह था कि ED की जिस अभियोजन शिकायत पर संज्ञान मांगा गया था, उसकी शुरुआत और कानूनी बुनियाद क्या थी। बाद में दर्ज FIR पुराने ED मामले की शुरुआत में मौजूद कथित प्रक्रियागत कमी को स्वतः दूर करती है या नहीं, यह भी कानूनी बहस का हिस्सा है।
ED की 2015 की सर्कुलर भी चर्चा में
हाई कोर्ट में चल रही कानूनी बहस में ED की 2015 की एक आंतरिक सर्कुलर का मुद्दा भी सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार इसमें अनुसूचित अपराध की FIR और संबंधित प्रक्रिया के बाद PMLA कार्यवाही आगे बढ़ाने से जुड़े निर्देशों का उल्लेख है। गांधी पक्ष इसे अपनी दलील के समर्थन में महत्वपूर्ण मानता है, जबकि ED निचली अदालत के निष्कर्ष को चुनौती दे रही है।इसलिए मामला केवल नेशनल हेराल्ड के वित्तीय लेनदेन के आरोपों तक सीमित नहीं है। हाई कोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न PMLA के तहत जांच और अभियोजन शुरू करने की कानूनी प्रक्रिया से भी जुड़ा है।
हाई कोर्ट के फैसले पर नजर
दिल्ली हाई कोर्ट में ED की याचिका पर सुनवाई जारी है। अदालत को तय करना है कि निचली अदालत का ED की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार करना कानून के अनुरूप था या एजेंसी की चुनौती स्वीकार किए जाने योग्य है। इस चरण में अदालत ने आरोपों पर अंतिम दोषसिद्धि या निर्दोषता तय नहीं की है।सोनिया गांधी और राहुल गांधी का पक्ष है कि मनी लॉन्ड्रिंग मामला अपनी मूल कानूनी बुनियाद के कारण टिकाऊ नहीं है। दूसरी ओर ED अपनी जांच और अभियोजन शिकायत को वैध बताते हुए निचली अदालत के आदेश को पलटने की मांग कर रही है। ऐसे में आगे की सुनवाई में PMLA के तहत प्रेडिकेट अपराध, FIR और निजी शिकायत के कानूनी संबंध पर अदालत की व्याख्या इस मामले के लिए अहम होगी।