Delhi 1975 में जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक बदलाव की अपील से लेकर 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन तक, रामलीला मैदान भारत के राजनीतिक इतिहास की कई अहम घटनाओं का केंद्र रहा है। पुरानी दिल्ली का यह मैदान, जिसे जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शनों पर रोक लगने के बाद राजधानी में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय तीन जगहों में से एक बनाया गया है, लंबे समय से बड़े पैमाने पर राजनीतिक लामबंदी (लोगों को एकजुट करने) का केंद्र रहा है।
इस मैदान पर सबसे अहम रैलियों में से एक 25 जून 1975 को हुई थी, जब समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था। उन्होंने उनके इस्तीफे की मांग की और एक हफ्ते तक चलने वाले सत्याग्रह की घोषणा की। उसी रात देश में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा कर दी गई, जिससे यह रैली देश के राजनीतिक इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना बन गई। नारायण 1977 में फिर रामलीला मैदान लौटे और उस साल लोकसभा चुनावों से पहले एक और बड़ी जनसभा को संबोधित किया; इन चुनावों में कांग्रेस को आजादी के बाद पहली बार केंद्र में सत्ता गंवानी पड़ी थी।
यह मैदान अगस्त 2011 में एक बार फिर देशव्यापी आंदोलन का केंद्र बना, जब सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक मजबूत जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। इस आंदोलन में भारी भीड़ जुटी और यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन बन गया। इसने उस राजनीतिक माहौल को बनाने में भी योगदान दिया जिसके बाद आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। रामलीला मैदान में राजनीतिक दलों, किसान संगठनों और अन्य समूहों की रैलियां भी होती रही हैं, जो अपनी मांगों को मनवाने या जनसमर्थन जुटाने के लिए ऐसा करते हैं। राजनीति के अलावा, यह मैदान सालाना रामलीला उत्सव के लिए भी जाना जाता है।