दिल्ली :राष्ट्रगीत **'वंदे मातरम्'** को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने इस विवाद के बीच अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि पार्टी कार्यक्रमों में **वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों** का ही गायन किया जाएगा। पार्टी का कहना है कि यही परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और इसका ऐतिहासिक आधार भी है।
वंदे मातरम् को लेकर हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई है। बीजेपी की ओर से कांग्रेस पर आरोप लगाया गया कि वह राष्ट्रगीत के सम्मान को लेकर गंभीर नहीं है, जबकि कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वह वंदे मातरम् का पूरा सम्मान करती है और इसे लेकर कोई विवाद नहीं है।
कांग्रेस ने क्यों लिया दो पदों का रुख?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाने की परंपरा रही है। पार्टी का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी कांग्रेस ने इन्हीं पदों को प्रमुखता दी थी।
ऐतिहासिक रूप से वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया था। वर्ष 1937 में कांग्रेस ने भी सार्वजनिक आयोजनों के लिए इसके शुरुआती हिस्से को अपनाने का निर्णय लिया था। बाद में संविधान सभा ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया और इसे जन गण मन के समान आदर देने की बात कही थी।
बीजेपी और कांग्रेस के बीच बढ़ा विवाद
वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि राष्ट्रगीत के पूरे स्वरूप को सम्मान मिलना चाहिए और इसे लेकर किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
वहीं, कांग्रेस का कहना है कि पार्टी हमेशा से वंदे मातरम् का सम्मान करती रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि विवाद पैदा करने के बजाय राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक संदर्भ को समझना चाहिए।
वंदे मातरम् का ऐतिहासिक महत्व
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रभावना जगाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना।
स्वतंत्रता संग्राम के समय कई आंदोलनों और सभाओं में वंदे मातरम् का इस्तेमाल लोगों को एकजुट करने के लिए किया गया। यही कारण है कि इसे भारतीय इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है।
1950 में संविधान सभा के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान दिया जाएगा।
पूरे गीत और शुरुआती पदों पर क्यों होती है चर्चा?
वंदे मातरम् के पूरे गीत में कई पद हैं, लेकिन सार्वजनिक कार्यक्रमों में लंबे समय से इसके शुरुआती पदों का गायन अधिक प्रचलित रहा है।
कुछ राजनीतिक और सामाजिक समूहों का मानना है कि पूरे गीत को गाया जाना चाहिए, जबकि कुछ लोग शुरुआती पदों की परंपरा को जारी रखने के पक्ष में हैं। इसी अंतर के कारण समय-समय पर इस विषय पर बहस होती रही है।
कांग्रेस का कहना क्या है?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम् किसी एक दल या विचारधारा से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह देश के स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत है।
पार्टी का कहना है कि राष्ट्रगीत का सम्मान सभी को करना चाहिए, लेकिन इसे राजनीतिक विवाद का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि पार्टी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का गायन जारी रहेगा, लेकिन परंपरा के अनुसार शुरुआती दो पदों को प्राथमिकता दी जाएगी। 
राजनीतिक असर
वंदे मातरम् का मुद्दा अक्सर भारतीय राजनीति में भावनात्मक और वैचारिक बहस का विषय बनता रहा है। राष्ट्रवाद, संस्कृति और इतिहास से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दल अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार रुख रखते हैं।
इस बार भी यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब देश में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। बीजेपी जहां इसे राष्ट्रीय सम्मान से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे ऐतिहासिक परंपरा और संवैधानिक भावना से जोड़कर देख रही है।
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