नई दिल्ली। दुर्गा पूजा और नवरात्रि के समय मांसाहार को लेकर छिड़ी बहस अब धार्मिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की मांसाहार से दूरी बनाने की अपील के बाद अब प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य **संजीव सान्याल** ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म की शाक्त परंपरा में मांसाहार का स्थान रहा है और इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
संजीव सान्याल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि भारत की धार्मिक परंपराएं बहुत विविध हैं। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में अलग-अलग संप्रदाय और मान्यताएं हैं, जिनमें भोजन से जुड़े नियम भी अलग-अलग हो सकते हैं।
बाबा बागेश्वर की अपील के बाद शुरू हुआ विवाद
दरअसल, बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पश्चिम बंगाल में एक कार्यक्रम के दौरान लोगों से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार से बचने की अपील की थी।
उन्होंने कहा था कि देवी की पूजा के दिनों में सात्विक भोजन करना चाहिए और पूजा पंडालों के आसपास मांस की बिक्री नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद बंगाल में राजनीतिक और सामाजिक बहस शुरू हो गई।
कुछ लोगों ने इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय बताया, जबकि कई लोगों ने इसे व्यक्तिगत खान-पान की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा।
संजीव सान्याल ने क्या कहा?
संजीव सान्याल ने बाबा बागेश्वर की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हिंदू धर्म में कई परंपराएं मौजूद हैं। उन्होंने विशेष रूप से शाक्त परंपरा का उल्लेख किया, जिसमें देवी की पूजा की जाती है।
उन्होंने कहा कि शाक्त हिंदू परंपरा में कुछ स्थानों पर मांसाहार धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा रहा है। इसलिए पूरे हिंदू धर्म को केवल एक भोजन पद्धति से जोड़ना सही नहीं होगा।
सान्याल ने यह भी कहा कि भारत की धार्मिक विविधता को समझना जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और खान-पान की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
बंगाल भाजपा अध्यक्ष भी जता चुके हैं असहमति
इस विवाद में पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य का बयान भी चर्चा में आया था। उन्होंने कहा था कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे, इसका फैसला कोई बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकता।
उन्होंने बंगाली संस्कृति और खान-पान की परंपराओं का जिक्र करते हुए कहा था कि लोगों को अपनी पसंद के अनुसार भोजन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
भट्टाचार्य ने यह भी कहा था कि बंगाल की धार्मिक परंपराओं को उसी सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में समझना चाहिए।
हिंदू धर्म में भोजन को लेकर अलग-अलग मान्यताएं
भारत में हिंदू धर्म के भीतर भोजन को लेकर कई तरह की मान्यताएं देखने को मिलती हैं। कई समुदाय शाकाहार को आध्यात्मिक अनुशासन से जोड़ते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में मांसाहार को धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा माना जाता है।
शाक्त परंपरा में देवी उपासना के कई स्वरूप हैं, जिनमें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज अपनाए जाते हैं। वहीं कई भक्त नवरात्रि जैसे अवसरों पर उपवास और सात्विक भोजन को प्राथमिकता देते हैं।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस
संजीव सान्याल के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस तेज हो गई है। एक वर्ग ने उनके बयान को धार्मिक विविधता की बात बताते हुए समर्थन किया, जबकि कुछ लोगों ने धार्मिक अवसरों पर मांसाहार से बचने की परंपरा का समर्थन किया।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारत में धर्म, संस्कृति और खान-पान की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा छेड़ दी है।
व्यक्तिगत आस्था और परंपरा का सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विविध देश में धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को एक ही नजरिए से देखना मुश्किल है। अलग-अलग समुदायों और क्षेत्रों की अपनी परंपराएं हैं, जिन्हें समझना जरूरी है।
फिलहाल बाबा बागेश्वर की अपील और उस पर आए जवाबों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में बना हुआ है।
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