Delhi दिल्ली डायबिटीज न होने का मतलब यह नहीं है कि ज़्यादा वज़न वाले व्यक्ति की किडनी सुरक्षित है। AIIMS-दिल्ली की एक स्टडी में पाया गया है कि मोटापा किडनी पर शुरुआती दबाव (स्ट्रेस) से जुड़ा हो सकता है, भले ही किडनी-फ़ंक्शन के आम टेस्ट में कोई साफ़ समस्या न दिखे। यह जानकारी इसलिए अहम है क्योंकि इसके चेतावनी वाले संकेत सालों तक दिखाई नहीं दे सकते हैं। किडनी के आस-पास 'रीनल साइनस' में ज़्यादा फ़ैट जमा हो सकता है, जिससे किडनी के अंदर की बनावट और रक्त वाहिकाओं पर असर पड़ सकता है। पहले की रिसर्च में भी रीनल-साइनस फ़ैट का मोटापा और हाई ब्लड प्रेशर से संबंध पाया गया है।
डॉ. अमनदीप सिंह की अगुवाई में हुई AIIMS की इस रिसर्च में 160 ऐसे वयस्क शामिल थे जिन्हें पहले से कोई दूसरी बीमारी नहीं थी। इसमें मोटापे के साथ-साथ किडनी से जुड़े बायोमार्कर की भी जांच की गई। किडनी की चोट से जुड़े मार्कर 'सीरम NGAL' का स्तर मोटापे के बढ़ने के साथ काफ़ी ज़्यादा पाया गया। AIIMS की स्टडी के नतीजों से पता चलता है कि मेटाबॉलिक रूप से अस्वस्थ मोटे लोगों में से 77% में रीनल-साइनस फ़ैट ज़्यादा था, जबकि मेटाबॉलिक रूप से स्वस्थ मोटे लोगों में यह आंकड़ा 55% था। इससे पता चलता है कि वज़न मापने वाली मशीन पर दिखने वाला नंबर ही पूरी कहानी नहीं बताता; एक जैसे BMI वाले दो लोगों के शरीर में फ़ैट अलग-अलग तरह से जमा हो सकता है और इसलिए उन्हें अलग-अलग मेटाबॉलिक जोखिम हो सकते हैं।
यह चिंता उन लोगों के लिए खास तौर पर अहम है जो यह मान लेते हैं कि "डायबिटीज नहीं है तो किडनी का कोई जोखिम नहीं है"। मोटापे की वजह से किडनी में होने वाले शुरुआती बदलाव, रूटीन टेस्ट में दिखने वाली साफ़ गड़बड़ियों से पहले ही हो सकते हैं। इसलिए डॉक्टर सिर्फ़ वज़न पर ध्यान देने के बजाय ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की निगरानी करने और किडनी की सही जांच करवाने पर ज़ोर देते हैं, खासकर तब जब वज़न ज़्यादा बना हुआ हो। यह स्टडी यह साबित नहीं करती कि रीनल-साइनस फ़ैट ही किडनी की बीमारी का कारण है, लेकिन यह इस बात को मज़बूत करती है कि मोटापे को सिर्फ़ डायबिटीज या दिल की बीमारी के जोखिम के तौर पर नहीं, बल्कि किडनी की सेहत से जुड़ी समस्या के तौर पर भी देखा और उसका इलाज किया जाना चाहिए।