नई दिल्ली। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये खर्च कर अत्याधुनिक मशीनें और उपकरण तो खरीदे गए, लेकिन उनकी सही समय पर व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। कई अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर, तकनीशियन, लाइसेंस और जरूरी संसाधनों की कमी के चलते महंगे उपकरण वर्षों से बंद पड़े हैं और अब धूल फांक रहे हैं।
स्वास्थ्य व्यवस्था की इस बड़ी खामी का खुलासा वर्ष 2026 में विधानसभा में पेश कैग (CAG) की स्वास्थ्य विभाग की परफॉर्मेंस ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई सरकारी अस्पतालों ने आधुनिक चिकित्सा उपकरण तो खरीद लिए, लेकिन उन्हें चलाने के लिए आवश्यक मानव संसाधन और तकनीकी तैयारियां समय पर नहीं की गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि करोड़ों रुपये का निवेश मरीजों के इलाज में उपयोगी साबित नहीं हो सका।
रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर मशीनें स्थापित तो कर दी गईं, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर और टेक्नीशियन उपलब्ध नहीं थे। कुछ मामलों में लाइसेंस और जरूरी मंजूरियां लंबित रहीं, जबकि कई उपकरणों के संचालन के लिए आवश्यक रिएजेंट और अन्य सामग्री की व्यवस्था नहीं हो पाई। इस वजह से अस्पतालों में मौजूद अत्याधुनिक सुविधाएं मरीजों की पहुंच से दूर रहीं।
सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (DSCI) का सामने आया है। यहां सितंबर 2017 में करीब 15.42 करोड़ रुपये की लागत से खरीदी गई पीईटी साइक्लोट्रान मशीन अप्रैल 2022 से जुलाई 2026 तक निष्क्रिय रही। कैंसर मरीजों के इलाज और जांच में उपयोगी इस मशीन का लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं हो पाना स्वास्थ्य प्रबंधन पर सवाल खड़े करता है।
इसी तरह राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में 12 मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर में से छह लंबे समय तक उपयोग में नहीं आ सके। मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर आधुनिक सर्जरी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन इनके संचालन के लिए जरूरी व्यवस्था नहीं होने के कारण मरीजों को इसका फायदा नहीं मिला।
जनकपुरी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भी सात मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर वर्षों तक बंद पड़े रहे। बाद में इनमें से कुछ ही शुरू किए जा सके। इससे साफ होता है कि उपकरण खरीदने के बाद उनके संचालन की योजना पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
कैग रिपोर्ट में राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की अन्य सुविधाओं का भी जिक्र किया गया है। यहां आईसीयू बेड, विशेष कक्ष, ट्रांसप्लांट आईसीयू और स्टोन सेंटर जैसी सुविधाओं का भी लंबे समय तक पूरी क्षमता से उपयोग नहीं हो सका। जबकि इन सुविधाओं को विकसित करने में बड़ी धनराशि खर्च की गई थी।
लोक नायक अस्पताल में भी कई ईसीजी मशीनें खराब पड़ी रहीं। रिपोर्ट के अनुसार, 12 में से पांच ईसीजी मशीनें लंबे समय तक खराब स्थिति में थीं। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के दौरान खरीदे गए बड़ी संख्या में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, वेंटिलेटर और अन्य चिकित्सा उपकरण भी लंबे समय तक गोदामों में पड़े रहे।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मशीनें खरीद लेना पर्याप्त नहीं है। किसी भी आधुनिक चिकित्सा उपकरण को शुरू करने से पहले डॉक्टरों, तकनीशियनों की नियुक्ति, प्रशिक्षण, लाइसेंस और रखरखाव की व्यवस्था जरूरी होती है। यदि यह तैयारी पहले से नहीं की जाए तो महंगे उपकरण मरीजों के लिए उपयोगी साबित नहीं हो पाते।
कैग रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि सरकारी अस्पतालों में खरीद प्रक्रिया और संचालन व्यवस्था के बीच तालमेल की कमी है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यदि उपकरण इस्तेमाल में नहीं आते हैं तो इसका सीधा नुकसान मरीजों को उठाना पड़ता है।
अब सवाल उठ रहा है कि इन निष्क्रिय पड़े उपकरणों की जिम्मेदारी किसकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में किसी भी बड़े उपकरण की खरीद से पहले उसके संचालन, मानव संसाधन और रखरखाव की पूरी योजना तैयार की जानी चाहिए, ताकि सरकारी धन का सही उपयोग हो और मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके।