नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाई गई **UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026** को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा अपडेट दिया है। केंद्र ने अदालत को बताया कि इन गाइडलाइंस पर सरकार पुनर्विचार कर रही है। इस जानकारी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यूजीसी के नए नियमों की समीक्षा की जा रही है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि जब तक सरकार इस प्रक्रिया को पूरा नहीं कर लेती, तब तक मामले में अंतिम सवाल तय न किए जाएं।
क्या हैं UGC की नई गाइडलाइंस?
UGC ने साल 2026 में उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से नए नियम जारी किए थे। इनका मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता की शिकायतों से निपटने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाना था।
इन नियमों के तहत संस्थानों में समानता से जुड़ी समितियां, शिकायत निवारण व्यवस्था और भेदभाव रोकने के लिए विशेष प्रावधान किए जाने थे।
सरकार और यूजीसी का उद्देश्य था कि किसी भी छात्र को जाति, धर्म, लिंग या अन्य आधार पर भेदभाव का सामना न करना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
UGC के नए नियमों को लेकर कुछ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इन नियमों में कुछ प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनके दुरुपयोग की संभावना हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में इन नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी थी। अदालत ने शुरुआती तौर पर कहा था कि नियमों के कुछ हिस्से अस्पष्ट हैं और इनके गलत इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संतुलित और स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है।
2012 के नियम फिलहाल लागू
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाते हुए पुराने **UGC Equity Regulations, 2012** को जारी रखने का निर्देश दिया था। जब तक नए नियमों पर अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक पुराने नियमों के तहत ही व्यवस्था चलती रहेगी।
याचिकाकर्ताओं की क्या आपत्ति है?
नए नियमों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसमें "जातिगत भेदभाव" की परिभाषा को लेकर कुछ सवाल हैं। उनका तर्क है कि नियमों में कुछ वर्गों को लेकर विशेष प्रावधान बनाए गए हैं, जबकि सभी छात्रों के लिए समान सुरक्षा होनी चाहिए।
कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी चिंता जताई कि अगर शिकायतों की जांच के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होंगे तो गलत शिकायतों का खतरा बढ़ सकता है।
नियम बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
UGC के नए नियमों की पृष्ठभूमि में उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव और छात्रों की आत्महत्या से जुड़े मामले रहे हैं। साल 2019 में कुछ छात्रों के परिजनों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की मांग की गई थी।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को इस दिशा में नए नियम तैयार करने के लिए कहा था।
सरकार अब क्या कर सकती है?
केंद्र सरकार के पुनर्विचार के बाद संभावना है कि नियमों में कुछ बदलाव किए जाएं। सरकार यह देख सकती है कि:
* नियमों की भाषा को और स्पष्ट बनाया जाए।
* शिकायतों की प्रक्रिया को बेहतर किया जाए।
* सभी वर्गों के हितों का संतुलन रखा जाए।
* दुरुपयोग रोकने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय जोड़े जाएं।
हालांकि, अंतिम फैसला सरकार की समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी को मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है। अदालत अब चार सप्ताह बाद इस मामले पर आगे सुनवाई करेगी।
इस दौरान सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया जाएगा कि नए नियमों में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं या इन्हें किस रूप में आगे बढ़ाया जाएगा।
UGC नियमों को लेकर शिक्षा जगत में भी अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ लोग मानते हैं कि कैंपस में भेदभाव रोकने के लिए सख्त नियम जरूरी हैं, जबकि कुछ का कहना है कि नियम ऐसे होने चाहिए जिनसे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर और निष्पक्ष व्यवस्था बनाए रखना बेहद जरूरी है।