नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ी पत्रिका ‘ऑर्गनाइजर’ के एक संपादकीय में कांग्रेस और पूर्ववर्ती यूपीए सरकार पर निशाना साधा गया है। लेख में आरोप लगाया गया है कि सोनिया गांधी की अगुआई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) शासन व्यवस्था में “दिमागी नक्सल” प्रभाव का एक प्रमुख उदाहरण थी।
संपादकीय में दावा किया गया है कि “दिमागी नक्सल” वे लोग होते हैं जो शहरों में रहकर वैचारिक स्तर पर काम करते हैं और विभिन्न सामाजिक समूहों के नाम पर संगठनों के जरिए अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हैं। लेख में आरोप लगाया गया कि ऐसे लोग नीति निर्माण, नौकरशाही, शिक्षा, मीडिया और गैर सरकारी संगठनों जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
NAC को लेकर लगाए गए आरोप
‘ऑर्गनाइजर’ के संपादकीय में कहा गया कि यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सरकार के फैसलों और नीतियों को प्रभावित करने वाली संस्था थी। लेख में आरोप लगाया गया कि इसके जरिए कुछ लोगों ने “गुप्त एजेंडे” चलाने की कोशिश की। NAC का गठन 2004 में यूपीए सरकार के दौरान किया गया था। इसका उद्देश्य सरकार को सामाजिक और आर्थिक नीतियों पर सलाह देना था। परिषद में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे थे।
‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर जारी सियासत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में “दिमागी नक्सल” शब्द का इस्तेमाल किया था। इसके बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई। RSS की पत्रिका ने इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए अपने लेख में कांग्रेस और कुछ बुद्धिजीवी वर्गों पर निशाना साधा।
लेख में कहा गया कि हथियार उठाने वाले नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई के बाद अब वैचारिक स्तर पर सक्रिय लोगों की पहचान जरूरी है। इसमें दावा किया गया कि ऐसे लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं और नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
कांग्रेस नेताओं ने किया पलटवार
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी और RSS पर हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार आलोचना करने वालों और असहमति रखने वालों को निशाना बनाने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रही है। वहीं RSS समर्थित लेख में कहा गया कि “दिमागी नक्सल” शब्द का उद्देश्य उन लोगों की पहचान करना है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश करते हैं।
राजनीतिक बहस तेज
NAC और यूपीए शासन को लेकर यह विवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। बीजेपी समर्थक इसे नीति निर्माण में वैचारिक प्रभाव का मुद्दा बता रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक आरोप करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और चुनावी राजनीति में भी चर्चा का विषय बन सकता है।