नई दिल्ली। राष्ट्रीय गीत **'वंदे मातरम'** को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की सांसद और अभिनेत्री कंगना रनौत ने इस मुद्दे पर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि *'वंदे मातरम' केवल एक गीत नहीं बल्कि भारत की चेतना, स्वतंत्रता आंदोलन की भावना और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है।* कंगना ने आरोप लगाया कि कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी का विरोध करते-करते अब कई मुद्दों पर देश की भावनाओं के खिलाफ खड़ी दिखाई देने लगी है।कंगना रनौत ने कहा कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 'वंदे मातरम' ने लोगों में ऊर्जा और एकता का संचार किया था। यह गीत करोड़ों भारतीयों के लिए मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना को दर्शाता है। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान राजनीति से ऊपर होना चाहिए।
वंदे मातरम विवाद ने पकड़ा राजनीतिक रंग
दरअसल, 'वंदे मातरम' को लेकर हाल के दिनों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत के सम्मान को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं कांग्रेस ने भी पलटवार करते हुए कहा है कि पार्टी का इतिहास देश के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है और 'वंदे मातरम' के प्रति उसका सम्मान हमेशा रहा है।कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों ने हमेशा 'वंदे मातरम' का सम्मान किया है। उन्होंने बीजेपी के आरोपों को राजनीतिक हमला बताया।
कंगना ने कांग्रेस पर साधा निशाना
कंगना रनौत ने अपने बयान में कहा कि भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर किसी भी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार बीजेपी विरोध की राजनीति करते-करते कई बार ऐसे मुद्दों पर भी सवाल उठाती है, जो देश की भावनाओं से जुड़े हैं।उन्होंने कहा कि 'वंदे मातरम' भारत के स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न हिस्सा रहा है। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने इस नारे को अपने संघर्ष और साहस का प्रतीक बनाया था।कंगना ने कहा कि जो लोग देश की संस्कृति और इतिहास से जुड़े प्रतीकों को कमजोर करने की कोशिश करते हैं, वे जनता की भावनाओं को समझने में असफल रहते हैं।
वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व
'वंदे मातरम' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल था और बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख नारा बन गया। 1950 में इसे भारत के राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया।स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन गया था। कई स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपनी प्रेरणा का स्रोत माना।इस गीत के पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया। हालांकि, इसके कुछ हिस्सों को लेकर समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है।
बीजेपी और कांग्रेस के बीच बढ़ी बयानबाजी
वंदे मातरम को लेकर बीजेपी लगातार कांग्रेस पर निशाना साध रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस ने लंबे समय तक इस गीत को उचित सम्मान नहीं दिया। वहीं कांग्रेस का कहना है कि पार्टी का इतिहास ही देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है।दोनों दलों के बीच यह विवाद अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। बीजेपी जहां इसे राष्ट्र सम्मान का मुद्दा बता रही है, वहीं कांग्रेस इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगा रही है।
राष्ट्रीय प्रतीकों पर राजनीति क्यों होती है?
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर भावनाएं काफी मजबूत होती हैं। तिरंगा, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत जैसे विषयों पर राजनीतिक दल अक्सर अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार बयान देते हैं।राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दे जनता की भावनाओं से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए चुनावी और राजनीतिक माहौल में इन पर बहस तेज हो जाती है।
कंगना की राजनीतिक शैली
कंगना रनौत अपने बेबाक बयानों के लिए जानी जाती हैं। फिल्म अभिनेत्री से राजनीति में आने के बाद भी वह कई राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। वह हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद हैं।उनके समर्थक उनके बयानों को राष्ट्रहित से जोड़ते हैं, जबकि विरोधी कई बार उनके बयानों को राजनीतिक और विवादित बताते रहे हैं।
आगे भी जारी रह सकती है बहस
वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने पक्ष को जनता के सामने रख रहे हैं।जहां बीजेपी इसे राष्ट्रीय सम्मान और देशभक्ति का मुद्दा बता रही है, वहीं कांग्रेस अपने ऐतिहासिक योगदान का हवाला देकर जवाब दे रही है।कुल मिलाकर, 'वंदे मातरम' को लेकर छिड़ी बहस ने एक बार फिर दिखाया है कि भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दे केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन जाते हैं।