नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ दुनिया भर में डाटा को सुरक्षित रखने, प्रोसेस करने और जरूरत के समय तेजी से उपलब्ध कराने की आवश्यकता कई गुना बढ़ रही है। मैन्युफैक्चरिंग से लेकर बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल सेवाओं तक लगभग हर क्षेत्र में बड़ी मात्रा में डाटा तैयार हो रहा है। ऐसे में आने वाला दशक डाटा सेंटर उद्योग के बड़े विस्तार का दौर साबित हो सकता है।

डिजिटल सेवाओं का दायरा बढ़ने के साथ कंपनियों और सरकारी संस्थानों के सामने डाटा के सुरक्षित भंडारण की चुनौती भी बढ़ रही है। AI आधारित सेवाओं को संचालित करने के लिए बड़ी कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। यही वजह है कि डाटा सेंटर अब केवल सूचना संग्रह करने वाले केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के रूप में उभर रहे हैं।

वर्तमान में दुनिया में डाटा सेंटरों की कुल क्षमता करीब 124 गीगावाट बताई जा रही है। वर्ष 2030 तक इसे बढ़ाकर 170 से 300 गीगावाट के बीच पहुंचाने की तैयारी है। यह अनुमान बताता है कि अगले कुछ वर्षों में डाटा सेंटर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और क्षमता विस्तार देखने को मिल सकता है।

भारत भी इस वैश्विक विस्तार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। देश में फिलहाल डाटा सेंटर की क्षमता करीब 1.7 गीगावाट बताई जा रही है। इसे वर्ष 2030 तक करीब 13 गीगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। अगर यह लक्ष्य हासिल होता है तो अगले चार वर्षों में देश की डाटा सेंटर क्षमता में कई गुना बढ़ोतरी होगी।

भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बड़ी संख्या, तेजी से बढ़ता डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन कारोबार, क्लाउड सेवाएं, सोशल मीडिया, डिजिटल शिक्षा और सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण के कारण डाटा की मात्रा लगातार बढ़ रही है। अब AI के तेजी से विस्तार ने इस मांग को और बढ़ा दिया है।

AI मॉडल को प्रशिक्षित करने और उन्हें लगातार संचालित करने के लिए बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग संसाधनों की जरूरत पड़ती है। इसके लिए अत्याधुनिक सर्वर, स्टोरेज सिस्टम, हाई-स्पीड नेटवर्क और मजबूत डाटा सेंटर बुनियादी ढांचा जरूरी है। सामान्य डिजिटल सेवाओं की तुलना में AI आधारित कामकाज में कंप्यूटिंग क्षमता की आवश्यकता काफी अधिक हो सकती है।

मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी AI, ऑटोमेशन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स का इस्तेमाल बढ़ रहा है। आधुनिक कारखानों में मशीनों से लगातार डाटा तैयार होता है। उत्पादन की निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण, मशीनों के रखरखाव और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इस डाटा का विश्लेषण किया जाता है। इससे सुरक्षित और तेज डाटा प्रोसेसिंग की आवश्यकता बढ़ रही है।

बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में स्थिति और भी महत्वपूर्ण है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन के कारण हर दिन बड़े पैमाने पर डाटा तैयार होता है। वित्तीय संस्थानों को इस डाटा की सुरक्षा के साथ ग्राहकों को तेज सेवाएं भी उपलब्ध करानी होती हैं। AI का इस्तेमाल धोखाधड़ी की पहचान, जोखिम का आकलन और ग्राहक सेवाओं में भी बढ़ रहा है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में डिजिटल रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट, मेडिकल इमेजिंग और AI आधारित डायग्नोस्टिक सिस्टम से बड़ी मात्रा में डाटा तैयार हो रहा है। मरीजों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी होने के कारण यहां डाटा की सुरक्षा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण के साथ मजबूत डाटा सेंटर नेटवर्क की जरूरत बढ़ने की संभावना है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी ऑनलाइन कक्षाओं, डिजिटल पाठ्य सामग्री, वर्चुअल लर्निंग और AI आधारित शिक्षण प्लेटफॉर्म का विस्तार हुआ है। लाखों विद्यार्थियों द्वारा डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल किए जाने से डाटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की मांग लगातार बढ़ रही है।

भारत में डाटा सेंटर क्षमता को 1.7 गीगावाट से बढ़ाकर 13 गीगावाट करने का लक्ष्य केवल तकनीकी बुनियादी ढांचे के विस्तार तक सीमित नहीं रहेगा। इसके लिए बड़े निवेश, पर्याप्त बिजली, जमीन, हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी और मजबूत नेटवर्क की आवश्यकता होगी।

डाटा सेंटरों के लिए लगातार बिजली आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है। बड़े डाटा सेंटर में हजारों सर्वर एक साथ काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने के साथ उन्हें ठंडा रखने के लिए भी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। ऐसे में डाटा सेंटर क्षमता बढ़ने के साथ बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ सकती है।

यही कारण है कि डाटा सेंटर उद्योग के विस्तार के साथ ऊर्जा दक्षता पर भी ध्यान बढ़ रहा है। कंपनियों के सामने चुनौती होगी कि बढ़ती कंप्यूटिंग क्षमता के बावजूद बिजली की खपत और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को नियंत्रित किया जाए। नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाना भी इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

डाटा सेंटरों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती है। बैंकिंग, स्वास्थ्य, सरकारी सेवाओं और कंपनियों से संबंधित संवेदनशील जानकारी इन केंद्रों में रखी जाती है। साइबर हमलों और डाटा चोरी के बढ़ते खतरे के बीच भौतिक और डिजिटल दोनों स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

AI के बढ़ते उपयोग के कारण डाटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर में भी बदलाव हो रहा है। AI आधारित काम के लिए उच्च क्षमता वाले प्रोसेसर और विशेष कंप्यूटिंग सिस्टम की जरूरत होती है। इससे भविष्य के डाटा सेंटर मौजूदा केंद्रों की तुलना में अधिक शक्तिशाली कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस हो सकते हैं।

भारत के लिए डाटा सेंटर क्षमता का विस्तार आर्थिक अवसर भी लेकर आ सकता है। नए डाटा सेंटरों के निर्माण से आईटी, इंजीनियरिंग, बिजली, नेटवर्किंग, साइबर सुरक्षा और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा देश के भीतर अधिक डाटा स्टोरेज क्षमता उपलब्ध होने से डिजिटल सेवाओं के विस्तार को भी गति मिल सकती है।

दुनिया में मौजूदा 124 गीगावाट डाटा सेंटर क्षमता को 2030 तक 170 से 300 गीगावाट तक पहुंचाने की तैयारी बताती है कि वैश्विक स्तर पर डाटा इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग कितनी तेजी से बढ़ रही है। इसी अवधि में भारत अपनी क्षमता को करीब 1.7 गीगावाट से बढ़ाकर 13 गीगावाट करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और तेजी से बढ़ती डिजिटल सेवाओं के दौर में डाटा सेंटर डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनते जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में डाटा की मात्रा बढ़ने के साथ इसे सुरक्षित रखने और तेजी से प्रोसेस करने की आवश्यकता भी बढ़ेगी। ऐसे में वर्ष 2030 तक का समय भारत सहित पूरी दुनिया में डाटा सेंटर उद्योग के बड़े विस्तार का दौर बन सकता है।

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