नई दिल्ली। समुद्री अर्थव्यवस्था में भारत को वैश्विक ताकत बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया गया है। सरकारी कंपनी **Cochin Shipyard Limited (CSL)** ने UAE की वैश्विक समुद्री सेवा कंपनी **Drydocks World Dubai** के साथ हाथ मिलाया है। दोनों कंपनियों ने कोच्चि स्थित International Ship Repair Facility यानी ISRF को संचालित करने और इसका विस्तार करने के लिए **50:50 जॉइंट वेंचर** बनाया है।
इस साझेदारी का मकसद केवल भारतीय जहाजों की मरम्मत करना नहीं है। सरकार की नजर भारत के पास से गुजरने वाले विदेशी जहाजों को भी देश के शिप रिपेयर यार्ड तक लाने पर है। इससे भारत को विदेशी मुद्रा कमाने, हजारों कुशल रोजगार पैदा करने और कोच्चि को हिंद महासागर क्षेत्र के प्रमुख शिप रिपेयर हब के रूप में विकसित करने में मदद मिल सकती है।
इस समझौते की खास बात यह भी है कि इसे भारत के शिप रिपेयर सेक्टर में अपनी तरह की पहली पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप बताया गया है।
भारत और UAE ने मिलाया हाथ
Cochin Shipyard और Drydocks World के बीच जॉइंट वेंचर समझौते पर नई दिल्ली में BRICS Summit 2026 के दौरान हस्ताक्षर किए गए।
Drydocks World की ओर से CEO कैप्टन राडो एंटोलोविक और Cochin Shipyard की ओर से चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर जोस वी. जे. ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।
इस मौके पर केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और UAE के असिस्टेंट फॉरेन मिनिस्टर फॉर एडवांस्ड साइंस एंड टेक्नोलॉजी ओमरान शरफ अलहाशिमी भी मौजूद रहे।
दोनों कंपनियों के बीच इस साझेदारी की नींव India Maritime Week 2025 के दौरान रखी गई थी। उस समय शिप रिपेयर और उससे जुड़ी समुद्री सेवाओं में सहयोग की संभावनाएं तलाशने के लिए MoU हुआ था।
अब उसी सहयोग को औपचारिक जॉइंट वेंचर में बदल दिया गया है।
दोनों कंपनियों की 50-50 हिस्सेदारी
नए जॉइंट वेंचर में Cochin Shipyard और Drydocks World दोनों की **50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी** होगी।
शुरुआती पूंजी दोनों कंपनियां इक्विटी योगदान के जरिए देंगी।
साझेदारी के तहत कोच्चि की मौजूदा International Ship Repair Facility को ऑपरेट करने के साथ उसकी क्षमता भी बढ़ाई जाएगी।
इसका लक्ष्य भारत के घरेलू जहाजों के साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को भी शिप रिपेयर तथा दूसरी समुद्री सेवाएं देना है।
₹1800 करोड़ की वैल्यू वाला ISRF
कोच्चि स्थित International Ship Repair Facility इस पूरी योजना का केंद्र है।
इस सुविधा की स्वतंत्र वैल्यूएशन लगभग **1,800 करोड़ रुपये** की गई है। जॉइंट वेंचर के तहत इसे नई कंपनी को ट्रांसफर करने की योजना है।
ISRF करीब 30 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है और यहां 6,000 टन क्षमता वाला आधुनिक शिप लिफ्ट तथा ट्रांसफर सिस्टम मौजूद है।
इसके अलावा करीब 1,400 मीटर का वर्किंग/बर्थिंग स्पेस और छह वर्कस्टेशन उपलब्ध हैं।
मौजूदा क्षमता के आधार पर यहां एक साथ कई जहाजों पर काम किया जा सकता है और सालाना लगभग 82 जहाजों को संभालने की क्षमता बताई गई है।
10 नए वर्कस्टेशन जोड़ने की योजना
मौजूदा सुविधा को सिर्फ चलाया नहीं जाएगा बल्कि बड़े स्तर पर विस्तार भी किया जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में यहां **10 अतिरिक्त वर्कस्टेशन** जोड़ने की योजना है।
इससे एक समय में ज्यादा जहाजों की मरम्मत और रखरखाव किया जा सकेगा।
क्षमता बढ़ने से बड़े अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को आकर्षित करना आसान हो सकता है।
यह विस्तार भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक शिप रिपेयर बाजार बहुत बड़ा है और भारत अभी अपनी भौगोलिक स्थिति के मुकाबले इस बाजार का सीमित हिस्सा हासिल करता है।
अरब सागर के पास रणनीतिक लोकेशन
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है।
देश की समुद्री सीमा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट के बेहद करीब है। अरब सागर और हिंद महासागर से बड़ी संख्या में मालवाहक और दूसरे जहाज गुजरते हैं।
अगर इन जहाजों को मरम्मत, मेंटेनेंस और कन्वर्जन के लिए भारत में प्रतिस्पर्धी सुविधाएं मिलती हैं तो उन्हें दूर स्थित दूसरे अंतरराष्ट्रीय शिप रिपेयर हब तक जाने की जरूरत कम हो सकती है।
कोच्चि की स्थिति इसी वजह से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सरकार का मानना है कि भारत की रणनीतिक लोकेशन और वैश्विक व्यापार मार्गों से नजदीकी का इस्तेमाल करके विदेशी जहाजों को आकर्षित किया जा सकता है।
डॉलर में कैसे होगी कमाई?
यह इस योजना का सबसे दिलचस्प आर्थिक पहलू है।
जब कोई विदेशी जहाज भारत के शिपयार्ड में मरम्मत, मेंटेनेंस, कन्वर्जन या दूसरी समुद्री सेवाएं लेता है तो भारत एक सेवा निर्यातक की भूमिका में आता है।
अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों से मिलने वाला भुगतान विदेशी मुद्रा आय का स्रोत बन सकता है।
सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस तरह के शिप रिपेयर हब विदेशी निवेश आकर्षित करने और **foreign exchange यानी विदेशी मुद्रा अर्जित करने** में मदद कर सकते हैं।
हालांकि यह कहना अभी सही नहीं होगा कि भारत को इससे निश्चित रूप से इतने अरब डॉलर की कमाई होगी। सरकार या कंपनियों ने जॉइंट वेंचर के लिए कोई निश्चित डॉलर रेवेन्यू लक्ष्य सार्वजनिक नहीं किया है।
$30 अरब से बड़ा वैश्विक बाजार
भारत के लिए अवसर बड़ा इसलिए है क्योंकि वैश्विक शिप रिपेयर और मेंटेनेंस मार्केट का आकार काफी बड़ा है।
भारत के Directorate General of Maritime Administration से जुड़े एक विस्तृत नोट में वैश्विक शिप रिपेयर और मेंटेनेंस बाजार को **30 अरब डॉलर से अधिक सालाना** बताया गया है।
भारत का लक्ष्य इस बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है।
अगर अंतरराष्ट्रीय जहाज भारतीय सुविधाओं का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं तो इसका फायदा केवल शिपयार्ड को नहीं बल्कि सप्लायर, इंजीनियरिंग कंपनियों, लॉजिस्टिक्स, उपकरण निर्माताओं और स्थानीय सेवा उद्योग को भी मिल सकता है।
Drydocks World का अनुभव आएगा काम
इस साझेदारी में UAE की Drydocks World की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
कंपनी के पास बड़े जहाजों की मरम्मत, रखरखाव, बड़े कन्वर्जन प्रोजेक्ट और ऑफशोर इंजीनियरिंग का वैश्विक अनुभव है।
इसके पास अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों का नेटवर्क भी मौजूद है।
दूसरी तरफ Cochin Shipyard के पास भारतीय बाजार, स्थानीय इंजीनियरिंग, कुशल कार्यबल और जहाज निर्माण तथा मरम्मत का लंबा अनुभव है।
दोनों कंपनियों की इन क्षमताओं को एक साथ लाने का उद्देश्य भारत में विश्वस्तरीय शिप रिपेयर सेवा तैयार करना है।
रिपेयर में लगने वाला समय घटाने पर जोर
शिपिंग कंपनियों के लिए जहाज का कई दिनों तक बंद रहना महंगा पड़ता है।
जहाज जितने ज्यादा समय तक डॉक में रहेगा, उतने समय तक उसका व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो पाएगा।
इसी कारण शिप रिपेयर उद्योग में turnaround time यानी जहाज को जल्दी से जल्दी मरम्मत करके दोबारा परिचालन में भेजना बेहद महत्वपूर्ण है।
Cochin Shipyard का कहना है कि Drydocks World की वैश्विक विशेषज्ञता से बेहतर प्रक्रियाएं और तकनीक भारत आएंगी।
इससे रिपेयर में लगने वाला समय घटाने, गुणवत्ता सुधारने और सुरक्षा के नए मानक स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
हजारों कुशल नौकरियां बनने की उम्मीद
शिप रिपेयर एक ऐसा उद्योग है जिसमें बड़ी संख्या में तकनीकी और कुशल कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है।
इसमें मरीन इंजीनियर, वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन, मैकेनिक, डिजाइन इंजीनियर, पाइपिंग विशेषज्ञ, पेंटिंग और कोटिंग विशेषज्ञ सहित कई तरह के पेशेवर शामिल होते हैं।
इसके अलावा जहाजों के लिए स्पेयर पार्ट्स, स्टील, मशीनरी और दूसरी सामग्री की सप्लाई करने वाली कंपनियों को भी काम मिलता है।
केंद्रीय जहाजरानी मंत्रालय के अनुसार यह मॉडल भारत में हजारों कुशल रोजगार पैदा करने की क्षमता रखता है।
कोच्चि तक सीमित नहीं रहेगा मॉडल
सरकार की योजना इस मॉडल को केवल केरल के कोच्चि तक सीमित रखने की नहीं है।
बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सचिव विजय कुमार ने कहा है कि इस जॉइंट वेंचर मॉडल को भारत के विस्तृत समुद्री तट के दूसरे हिस्सों में भी दोहराया जा सकता है।
इसका अर्थ है कि भविष्य में देश के अलग-अलग तटीय क्षेत्रों में शिप रिपेयर और कन्वर्जन के विशेष हब तैयार किए जा सकते हैं।
भारत की लगभग पूरी समुद्री अर्थव्यवस्था को इससे एक नया औद्योगिक इकोसिस्टम मिल सकता है।
गुजरात में भी बन रहा बड़ा शिप रिपेयर सेंटर
कोच्चि की योजना अकेली नहीं है।
केंद्र सरकार ने मई 2026 में गुजरात के **वाडिनार** में आधुनिक शिप रिपेयर फैसिलिटी के विकास को मंजूरी दी थी।
इस परियोजना पर करीब **1,570 करोड़ रुपये** का संयुक्त निवेश प्रस्तावित है।
इसे Deendayal Port Authority और Cochin Shipyard मिलकर विकसित करेंगे।
इसमें 650 मीटर की जेटी, दो बड़े फ्लोटिंग ड्राई डॉक, वर्कशॉप और दूसरी समुद्री आधारभूत सुविधाएं विकसित की जानी हैं।
वाडिनार की गहरी समुद्री स्थिति और मुंद्रा तथा कांडला जैसे प्रमुख बंदरगाहों से निकटता इसे बड़े वाणिज्यिक और विदेशी जहाजों की मरम्मत के लिए उपयोगी बनाती है।
भारत में ही रुक सकता है रिपेयर का पैसा
इस योजना का एक दूसरा आर्थिक फायदा भी है।
अगर भारतीय जहाजों को बड़ी मरम्मत या विशेष काम के लिए विदेश जाना पड़ता है तो उसका भुगतान विदेश में होता है।
देश के भीतर विश्वस्तरीय क्षमता विकसित होने पर इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा भारत में रह सकता है।
साथ ही विदेशी जहाज भारत आने लगें तो विदेशी मुद्रा की अतिरिक्त कमाई हो सकती है।
इस तरह सरकार की रणनीति दो तरफा है—**भारतीय जहाजों के विदेशी रिपेयर खर्च को कम करना और विदेशी जहाजों से नया कारोबार हासिल करना।**
नौसेना और रणनीतिक क्षमता को भी फायदा
मजबूत घरेलू शिप रिपेयर इकोसिस्टम का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है।
देश में ज्यादा उन्नत डॉकिंग, रिपेयर, इंजीनियरिंग और मरीन सर्विस क्षमता विकसित होने से रणनीतिक समुद्री क्षमता को भी फायदा मिल सकता है।
किसी वैश्विक संकट या सप्लाई चेन बाधा के दौरान जहाजों के रखरखाव के लिए विदेशी सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
घरेलू क्षमता बढ़ने से भारत समुद्री क्षेत्र में ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकता है। नई साझेदारी को इसी व्यापक रणनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।
Maritime Amrit Kaal Vision 2047 से जुड़ा कदम
भारत सरकार ने Maritime Amrit Kaal Vision 2047 के तहत देश को वैश्विक समुद्री शक्ति बनाने का लक्ष्य रखा है।
इसमें बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, जहाज निर्माण, शिप रिपेयर, ग्रीन शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और समुद्री सेवाओं का विस्तार शामिल है।
सरकार चाहती है कि भारत केवल वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए बड़ा बाजार न रहे बल्कि जहाज निर्माण और मरम्मत जैसी उच्च मूल्य वाली सेवाओं में भी प्रमुख भूमिका निभाए।
Cochin Shipyard और Drydocks World का जॉइंट वेंचर इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
समुद्र में भारत के लिए बड़ा कारोबारी मौका
कुल मिलाकर भारत और UAE की यह साझेदारी देश के शिप रिपेयर सेक्टर को वैश्विक स्तर पर ले जाने की कोशिश है।
Cochin Shipyard की घरेलू क्षमता और Drydocks World के अंतरराष्ट्रीय अनुभव को मिलाकर कोच्चि में ऐसा शिप रिपेयर हब विकसित करने का लक्ष्य है जो भारतीय, क्षेत्रीय और विदेशी जहाजों को सेवाएं दे सके।
**50:50 जॉइंट वेंचर, करीब ₹1,800 करोड़ मूल्य वाली ISRF, 6,000 टन का शिप लिफ्ट, मौजूदा छह वर्कस्टेशन और भविष्य में 10 अतिरिक्त वर्कस्टेशन जोड़ने की योजना** इस परियोजना के पैमाने को दिखाती है।
अगर अंतरराष्ट्रीय जहाज बड़ी संख्या में भारत की तरफ आकर्षित होते हैं तो इससे विदेशी मुद्रा आय, कुशल रोजगार, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और समुद्री सेवा उद्योग को बड़ा फायदा मिल सकता है।
हालांकि डॉलर में वास्तविक कमाई कितनी होगी, यह आने वाले वर्षों में सुविधा की क्षमता, विदेशी जहाजों की संख्या और हासिल होने वाले अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट पर निर्भर करेगा।
फिलहाल इतना साफ है कि भारत अब अपनी लंबी समुद्री सीमा को केवल व्यापार मार्ग के रूप में नहीं बल्कि **जहाज निर्माण, रिपेयर और वैश्विक समुद्री सेवाओं से कमाई के बड़े आर्थिक अवसर** के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
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