नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग से शादी और उसके बाद यौन संबंध से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि शादी करने से किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत किसी शादी को वैध माना जाना, 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध के मामले में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस यानी POCSO एक्ट या भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत होने वाली कानूनी कार्रवाई से अपने आप छूट नहीं दिलाता।जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी एक व्यक्ति की ओर से उसके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग पर सुनवाई के दौरान की। व्यक्ति ने 16 साल और तीन महीने की लड़की से शादी की थी। अदालत ने उसके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया और नाबालिग की उम्र को कानून के तहत सबसे महत्वपूर्ण आधार माना।
कोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “सीधे शब्दों में कहें तो, शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती। जो व्यक्ति शादी की रस्म से पहले सोलह साल का था, वह उसके बाद भी सोलह साल का ही रहता है।”अदालत की इस टिप्पणी का मुख्य आधार नाबालिग की कानूनी उम्र और यौन संबंध के लिए सहमति देने की कानूनी क्षमता रही। कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट और BNS की धारा 63 के उद्देश्य से लड़की की उम्र ही यह तय करेगी कि वह यौन संबंध के लिए कानूनी रूप से सहमति देने में सक्षम है या नहीं।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पर्सनल लॉ के आधार पर ऐसा अपवाद नहीं बनाया जा सकता, जिसे संसद ने कानून बनाते समय स्पष्ट रूप से बाहर रखा हो। इसका अर्थ यह है कि विवाह की वैधता और यौन संबंध के लिए कानूनी सहमति की उम्र को अलग-अलग कानूनी सवालों के रूप में देखा जाएगा।
मामले में आरोपी व्यक्ति की ओर से FIR रद्द करने की मांग की गई थी। उसका मामला 16 साल और तीन महीने की लड़की से शादी से जुड़ा था। लेकिन अदालत ने इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने से इनकार कर दिया कि शादी होने के कारण नाबालिग की उम्र या उसके लिए लागू होने वाला बाल संरक्षण कानून बदल नहीं जाता।POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया है। इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी में भी इसी आयु सीमा को महत्व दिया गया। अदालत का कहना रहा कि विवाह की रस्म पूरी हो जाने के बाद भी नाबालिग की वास्तविक उम्र वही रहती है और कानून के तहत उसकी स्थिति अपने आप नहीं बदल जाती।
कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह को वैध माने जाने के कारण POCSO या BNS के तहत कार्रवाई से सुरक्षा मिलनी चाहिए। अदालत ने कहा कि पर्सनल लॉ के आधार पर संसद की ओर से निर्धारित कानूनी सुरक्षा को कमजोर करने वाला अलग अपवाद तैयार नहीं किया जा सकता।इस मामले में अदालत की टिप्पणी विवाह की वैधता से अधिक नाबालिगों की सुरक्षा और सहमति की कानूनी उम्र पर केंद्रित रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह तय करने में कि कोई लड़की यौन संबंध के लिए कानूनी सहमति दे सकती है या नहीं, उसकी उम्र निर्णायक होगी।
अदालत ने कहा कि शादी की रस्म किसी नाबालिग को कानूनी रूप से बालिग नहीं बनाती। अगर कोई लड़की शादी से पहले 16 साल की है तो शादी के बाद भी उसकी उम्र 16 साल ही रहेगी। इसलिए केवल विवाह के आधार पर उसके लिए POCSO के तहत मिलने वाली सुरक्षा समाप्त नहीं हो सकती।कोर्ट की टिप्पणी इस बात पर भी जोर देती है कि पर्सनल लॉ और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े विशेष आपराधिक कानूनों के बीच किसी मामले में टकराव का सवाल उठने पर बच्चे की आयु और संसद द्वारा बनाए गए सुरक्षा प्रावधानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले में अदालत ने FIR रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने आरोपी को दोषी ठहरा दिया है। FIR रद्द करने से इनकार करने का अर्थ केवल इतना है कि इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने का आधार अदालत को नहीं मिला। आरोपों और मामले से जुड़े तथ्यों का फैसला संबंधित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होगा।दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश के जरिए साफ किया कि किसी नाबालिग की शादी हो जाने मात्र से उसके लिए लागू बाल संरक्षण कानून खत्म नहीं हो जाते। विवाह को किसी पर्सनल लॉ के तहत मान्यता मिलने का सवाल अलग हो सकता है, लेकिन POCSO और BNS के तहत यौन संबंध के लिए सहमति की कानूनी क्षमता तय करते समय लड़की की उम्र को ही आधार माना जाएगा।
जस्टिस संजीव नरूला की टिप्पणी का केंद्र भी यही रहा कि कानून के सामने उम्र एक वास्तविक तथ्य है, जिसे विवाह की रस्म नहीं बदल सकती। अदालत ने इसी आधार पर कहा कि शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती और 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा केवल विवाह के कारण समाप्त नहीं हो सकती।इस मामले में कोर्ट ने पर्सनल लॉ के आधार पर POCSO और BNS के प्रावधानों से छूट की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार करते हुए साफ किया कि नाबालिग की उम्र ही उसकी यौन संबंध के लिए कानूनी सहमति देने की क्षमता तय करने का प्रमुख आधार है।