देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत ने बुधवार को कहा कि वह अपनी स्वतंत्र ‘जन संवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी के भीतर उठे विवाद पर शीर्ष नेतृत्व के सामने अपना पक्ष रखने के लिए दिल्ली जा रहे हैं। उन्होंने इस दौरान कांग्रेस के साथ अपने करीब छह दशक पुराने जुड़ाव का भी उल्लेख किया और कहा कि पार्टी से उनका रिश्ता बेहद पुराना और गहरा है।हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जन संवाद यात्रा’ को लेकर पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड कांग्रेस में राजनीतिक हलचल तेज है। पार्टी नेतृत्व ने इस स्वतंत्र यात्रा के समय और स्वरूप को लेकर आपत्ति जताई थी और संगठनात्मक एकजुटता पर जोर दिया था। इसके बावजूद रावत ने जसपुर से हल्द्वानी तक अपनी यात्रा शुरू की, जिससे पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए।रावत ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा कि 14 अक्टूबर को कांग्रेस की औपचारिक सदस्यता के उनके 58 वर्ष पूरे हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि औपचारिक रूप से पार्टी का सदस्य बनने से करीब दो वर्ष पहले ही वह कांग्रेस की युवा शाखा से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय होने लगे थे। इस हिसाब से अक्टूबर 2026 में कांग्रेस के साथ उनके जुड़ाव को 60 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
रावत ने लिखा, “इस 14 अक्टूबर को कांग्रेस के साथ मेरा औपचारिक रिश्ता, यानी मेरी सदस्यता, 58 साल पूरे कर लेगी। मैंने उससे दो साल पहले ही कांग्रेस की युवा शाखा के कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था, यानी इस अक्टूबर में कांग्रेस के साथ मेरे जुड़ाव को 60 साल हो जाएंगे।”पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने लंबे राजनीतिक संबंध का जिक्र ऐसे समय किया है जब पार्टी नेतृत्व ने उनकी व्यक्तिगत यात्रा को लेकर उनसे स्पष्टीकरण मांगा है। रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने उन्हें दिल्ली बुलाया है। प्रस्तावित बैठक में उत्तराखंड में पार्टी की एकजुटता, आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों और अलग-अलग नेताओं की व्यक्तिगत यात्राओं को लेकर चर्चा होने की उम्मीद है।
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस संगठन अपनी रणनीति को एकजुट स्वरूप देने की कोशिश कर रहा है। इसी पृष्ठभूमि में हरीश रावत की स्वतंत्र जन संवाद यात्रा ने पार्टी के भीतर बहस पैदा की है। कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि सभी कार्यक्रम संगठन की सामूहिक रणनीति के तहत होने चाहिए, जबकि रावत समर्थक इस यात्रा को जनता से सीधा संवाद और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की पहल बताते हैंपार्टी नेतृत्व की ओर से संकेत दिया गया था कि उत्तराखंड में व्यक्तिगत अभियान के बजाय सामूहिक कार्यक्रमों पर अधिक जोर दिया जाए। रिपोर्टों के अनुसार, प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा ने भी रावत की यात्रा को लेकर आपत्ति जताई थी और कहा था कि चुनावी तैयारियों के दौरान संगठनात्मक समन्वय जरूरी है।
हरीश रावत ने हालांकि अपनी यात्रा को लेकर कहा है कि इसका उद्देश्य पार्टी से अलग कोई समानांतर राजनीतिक अभियान खड़ा करना नहीं है। उन्होंने यात्रा को जनसंपर्क और कार्यकर्ताओं से संवाद का माध्यम बताया है। हल्द्वानी में जन संवाद कार्यक्रम के दौरान भी उन्होंने कहा था कि उनकी यात्रा का कोई व्यक्तिगत राजनीतिक मकसद नहीं है।रावत की यात्रा जसपुर से शुरू होकर काशीपुर, रामनगर, कालाढूंगी और हल्द्वानी तक पहुंची। यात्रा के दौरान कई स्थानीय कांग्रेस नेता और समर्थक उनके साथ नजर आए। इससे उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन और नेतृत्व को लेकर चल रही चर्चा भी तेज हुई।
बताया जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान चाहता है कि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सभी वरिष्ठ नेता एक साझा रणनीति के तहत काम करें। पार्टी के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है और ऐसे में आंतरिक मतभेदों को कम करने की कोशिश की जा रही है।दूसरी ओर हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं और लंबे समय से राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहने के साथ-साथ केंद्र सरकार में मंत्री और कांग्रेस संगठन में भी कई जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। ऐसे में उनकी स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों को लेकर पार्टी के भीतर होने वाली हर हलचल का असर राज्य की राजनीति पर दिखाई देता है।
रावत ने अपने 60 साल पुराने कांग्रेस संबंध का उल्लेख कर यह संदेश देने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक पहचान पार्टी से अलग नहीं है। उनका कहना है कि वह कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं और पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी बात स्पष्ट रूप से रखेंगे।रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान ने उनकी यात्रा पर आपत्ति जताने के बाद उन्हें दिल्ली बुलाया। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि शीर्ष नेतृत्व की सख्ती के बाद यात्रा को आगे बढ़ाने पर पुनर्विचार किया गया।
उत्तराखंड में कांग्रेस के भीतर पिछले कुछ समय से नेतृत्व, टिकट वितरण और चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग स्वर सामने आते रहे हैं। ऐसे में रावत की जन संवाद यात्रा को सिर्फ एक स्थानीय कार्यक्रम के बजाय पार्टी की अंदरूनी राजनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है।हालांकि रावत ने बार-बार कहा है कि उनकी प्राथमिकता कांग्रेस को मजबूत करना और जनता से संवाद बनाए रखना है। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि वह दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के सामने यात्रा की पृष्ठभूमि और उद्देश्य स्पष्ट करेंगे।
उनकी दिल्ली यात्रा अब राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह बैठक केवल जन संवाद यात्रा के विवाद तक सीमित रहेगी या उत्तराखंड कांग्रेस की व्यापक रणनीति पर भी चर्चा होगी, इस पर नजर रहेगी।कुल मिलाकर, हरीश रावत ने अपने लगभग छह दशक पुराने कांग्रेस संबंध का उल्लेख करते हुए साफ किया है कि वह पार्टी नेतृत्व से संवाद के लिए दिल्ली जा रहे हैं। जन संवाद यात्रा को लेकर पैदा हुए विवाद के बीच उनकी यह पहल उत्तराखंड कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को सुलझाने और आगामी चुनाव से पहले संगठनात्मक तालमेल स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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