नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में सर्दियों की दस्तक से पहले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने तैयारियां तेज कर दी हैं। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने सोमवार, 19 अक्टूबर को नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (NDMC) क्षेत्र में एंटी-स्मॉग गन और वाटर मिस्ट सिस्टम का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि बड़ी व्यावसायिक इमारतों, होटलों, संस्थानों और निर्माण स्थलों पर प्रदूषण नियंत्रण के निर्धारित नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। मंत्री ने चेतावनी दी कि नियमों की अनदेखी करने वाले संस्थानों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।दिल्ली सरकार का उद्देश्य सर्दियों में बढ़ने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना और हवा में मौजूद धूल के कणों को कम करना है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की उपलब्धता और उनके संचालन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
NDMC क्षेत्र में एंटी-स्मॉग गन का निरीक्षण
पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने एनडीएमसी क्षेत्र में लगाए गए एंटी-स्मॉग गन और वाटर मिस्ट सिस्टम की कार्यप्रणाली का जायजा लिया। उन्होंने अधिकारियों से उपकरणों के संचालन, रखरखाव और प्रदूषण नियंत्रण में उनकी उपयोगिता के संबंध में जानकारी ली।मंत्री ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल उपकरण स्थापित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका निर्धारित मानकों के अनुसार संचालन भी जरूरी है।उन्होंने संबंधित विभागों को प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पालन कराने और लापरवाही पाए जाने पर आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।
बड़ी इमारतों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण जरूरी
दिल्ली सरकार और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के निर्देशों के अनुसार, निर्धारित श्रेणी की ऊंची व्यावसायिक इमारतों में एंटी-स्मॉग गन या वाटर मिस्ट सिस्टम लगाना अनिवार्य है।नियमों में 3,000 वर्ग मीटर से अधिक निर्मित क्षेत्र वाले व्यावसायिक परिसरों, मॉल और होटलों के साथ ग्राउंड प्लस पांच मंजिल या उससे अधिक ऊंचाई वाले कार्यालय तथा संस्थागत भवनों को शामिल किया गया है।सरकार ने इन इमारतों में धूल नियंत्रण के लिए उपकरण स्थापित करने और निर्धारित अवधि में उनका संचालन सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए हैं।
नियम नहीं मानने वालों पर होगी कार्रवाई
मंत्री सिरसा ने अधिकारियों से स्पष्ट कहा कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए जारी दिशानिर्देशों को गंभीरता से लागू किया जाए।जिन संस्थानों और भवनों पर एंटी-स्मॉग गन या वाटर मिस्ट सिस्टम लगाना अनिवार्य है, वहां इनके संचालन की जांच की जाए।निर्देशों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों के खिलाफ संबंधित पर्यावरण कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत व्यापक निर्देश भी जारी किए हैं।
निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के निर्देश
दिल्ली में निर्माण गतिविधियों से निकलने वाली धूल वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसी कारण सरकार ने निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण उपायों को अनिवार्य किया है।निर्धारित आकार की निर्माण परियोजनाओं में एंटी-स्मॉग गन लगाने, निर्माण सामग्री को ढककर रखने और धूल उड़ने से रोकने के लिए पानी का छिड़काव करने जैसे उपाय शामिल हैं।सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, 5,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक निर्माण क्षेत्र वाली परियोजनाओं में क्षेत्रफल के हिसाब से पर्याप्त एंटी-स्मॉग गन लगाने की व्यवस्था है।
कैसे काम करती है एंटी-स्मॉग गन?
एंटी-स्मॉग गन एक विशेष उपकरण है, जो पानी की बेहद छोटी बूंदों को हवा में फैलाता है। ये बूंदें हवा में मौजूद धूल के कुछ कणों को नीचे बैठाने में मदद कर सकती हैं।वाटर मिस्ट सिस्टम भी इसी सिद्धांत पर काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उड़ने वाली धूल को कम करना है।हालांकि, ये उपकरण वायु प्रदूषण का पूर्ण समाधान नहीं हैं। वाहनों के उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधियों और अन्य प्रदूषण स्रोतों को नियंत्रित करना भी जरूरी है।
सर्दियों में क्यों बढ़ता है दिल्ली का प्रदूषण?
दिल्ली में सर्दियों के दौरान हवा की गति कम होने और तापमान से जुड़ी मौसमी परिस्थितियों के कारण प्रदूषक वातावरण में जमा हो सकते हैं।इस दौरान पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कणों की बढ़ती मात्रा लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बनती है।दिल्ली के पर्यावरण विभाग के अनुसार, स्थानीय उत्सर्जन के साथ मौसम और आसपास के क्षेत्रों में होने वाली गतिविधियां भी राजधानी की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
प्रदूषण नियंत्रण के लिए सरकार का विशेष अभियान
दिल्ली सरकार सर्दियों में प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दे रही है।पर्यावरण मंत्री सिरसा के निरीक्षण को इसी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार की प्राथमिकता है कि निर्धारित भवनों और निर्माण स्थलों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण प्रभावी ढंग से काम करें।आने वाले दिनों में इन उपायों का प्रभाव वास्तविक वायु गुणवत्ता के आंकड़ों और प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण से स्पष्ट होगा।
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