दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को इस महीने की शुरुआत में जंतर-मंतर के पास एक विरोध प्रदर्शन के दौरान एक महिला पत्रकार के खिलाफ कथित जातिवादी टिप्पणी और सार्वजनिक अपमान को लेकर एक पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज मामले की जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने कहा कि अदालत इस स्तर पर अंतरिम प्रार्थना को खारिज नहीं कर रही है और वह इस पर कोई आदेश भी पारित नहीं कर रही है।
अदालत ने एफआईआर रद्द करने की मांग करने वाली पत्रकार की याचिका पर दिल्ली पुलिस और मामले में शिकायतकर्ता सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) विवेक भगत को नोटिस जारी किया और उन्हें सुनवाई की अगली तारीख 16 नवंबर से पहले अपना जवाब दाखिल करने को कहा। न्यायाधीश ने कहा, "मैं अभी किसी भी प्रार्थना को खारिज नहीं कर रहा हूं। मैं केवल उन्हें नोटिस जारी कर रहा हूं। मामले पर विचार की जरूरत है, अंतिम सुनवाई 16 नवंबर को होगी।"
इससे पहले महिला पत्रकार ने एसीपी भगत के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. उनकी शिकायत की जांच दिल्ली पुलिस अपराध शाखा द्वारा की जा रही है। मुंशी के वकील ने तर्क दिया कि एसीपी द्वारा दर्ज की गई एफआईआर केवल उन्हें उनके खिलाफ शिकायत का पालन न करने के लिए डराने के लिए दर्ज की गई थी। उच्च न्यायालय ने महिला पत्रकार के एक पुरुष सहकर्मी द्वारा उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली एक अन्य याचिका पर भी इसी तरह का आदेश पारित किया।
दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले के कनॉट प्लेस सब-डिवीजन में तैनात भगत की शिकायत पर स्वतंत्र पत्रकार और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, जिसमें विरोध प्रदर्शन के दौरान अधिकारी पर जातिवादी टिप्पणी, सार्वजनिक अपमान और मानहानि का आरोप लगाया गया था। एफआईआर एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 221 (एक लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकना), 356(2) (मानहानि) और 3(5) (सामान्य इरादा) के तहत दर्ज की गई थी।