नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ते तापमान, सूखा, बाढ़ और अत्यधिक बारिश जैसी चरम मौसमी घटनाओं तक सीमित नहीं रहा है। बदलते मौसम ने दुनिया के कई हिस्सों में खाद्य उत्पादन को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इसका सीधा असर आम लोगों की रसोई और खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। सूखा, रिकॉर्ड गर्मी और अत्यधिक बारिश के कारण कॉफी, मांस, सब्जियों, आलू और समुद्री शैवाल जैसी खाद्य वस्तुओं का उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिससे कई क्षेत्रों में इनकी कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का पुराना चक्र लगातार बदल रहा है। किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश नहीं हो रही तो कहीं अचानक अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन रही है। कई जगह रिकॉर्ड तापमान फसलों के लिए नई चुनौती बन रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर कृषि और खाद्य उत्पादन पर पड़ता है, क्योंकि फसलों की पैदावार काफी हद तक तापमान, बारिश और मिट्टी में उपलब्ध नमी पर निर्भर करती है।

हाल के वर्षों में दुनिया के कई प्रमुख खाद्य उत्पादक क्षेत्रों में मौसम से जुड़ी असामान्य घटनाएं देखने को मिली हैं। कहीं सूखे के कारण फसलें प्रभावित हुईं तो कहीं लगातार बारिश से खेतों में पानी भर गया। अत्यधिक गर्मी के कारण कई फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में कमी देखने को मिली। उत्पादन में कमी का असर बाजार में उपलब्धता पर पड़ता है और मांग के मुकाबले आपूर्ति घटने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं।

कॉफी भी उन खाद्य वस्तुओं में शामिल है, जिन पर बदलते मौसम का असर साफ दिखाई दे रहा है। कॉफी उत्पादन के लिए एक निश्चित तापमान और बारिश की जरूरत होती है। जरूरत से ज्यादा गर्मी या बारिश कम होने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम खराब होने का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है और इससे कॉफी की कीमतों में तेजी आ सकती है। मौजूदा मजबूत अल नीनो के कारण भी कई कृषि क्षेत्रों में जोखिम बढ़े हैं।

सब्जियों और आलू जैसी फसलों पर भी चरम मौसम का सीधा असर पड़ता है। ज्यादा गर्मी से फसल की वृद्धि प्रभावित हो सकती है, जबकि अत्यधिक बारिश खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। यदि उत्पादन घटता है तो स्थानीय बाजारों में आपूर्ति कम हो जाती है और कुछ ही समय में कीमतें बढ़ने लगती हैं।

मांस की कीमतों पर भी जलवायु परिवर्तन का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। सूखे के दौरान पशुओं के लिए चारा और पानी की उपलब्धता कम होती है। इससे पशुपालन की लागत बढ़ सकती है। चारे के उत्पादन में कमी और तापमान बढ़ने से पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता पर भी असर पड़ता है। इन सभी कारणों से मांस की आपूर्ति और कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।

समुद्री खाद्य उत्पादन भी बदलते मौसम से अछूता नहीं है। समुद्र के पानी का तापमान बढ़ने और समुद्री हीटवेव जैसी स्थितियां मछलियों, समुद्री पौधों और शैवाल पर असर डाल सकती हैं। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव होने से उन समुदायों और उद्योगों पर भी असर पड़ता है, जो समुद्र से मिलने वाले खाद्य उत्पादों पर निर्भर हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में अल नीनो की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसके कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान का पैटर्न बदल सकता है। कुछ क्षेत्रों में सूखा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ की आशंका बढ़ सकती है।

जब अल नीनो पहले से गर्म हो रही दुनिया में सक्रिय होता है तो उसका असर और गंभीर हो सकता है। जलवायु परिवर्तन वैश्विक तापमान को ऊपर ले जा रहा है और ऐसे में प्राकृतिक जलवायु घटनाओं के साथ मिलकर चरम मौसम का खतरा बढ़ सकता है। खेती के लिहाज से इसका मतलब है कि किसानों को मौसम की अनिश्चितता का सामना अधिक करना पड़ सकता है।

खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का सबसे ज्यादा असर कम और मध्यम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। ऐसे परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। यदि सब्जियां, अनाज, मांस या अन्य जरूरी खाद्य वस्तुएं अचानक महंगी हो जाएं तो घरेलू बजट प्रभावित होता है। लंबे समय तक कीमतें ऊंची रहने पर लोगों की भोजन संबंधी पसंद भी बदल सकती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य महंगाई केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहती। वैश्विक व्यापार के कारण एक क्षेत्र में उत्पादन घटने का असर दूसरे देशों में भी महसूस किया जा सकता है। यदि कोई देश किसी खाद्य वस्तु का बड़ा उत्पादक या निर्यातक है और वहां खराब मौसम से उत्पादन गिर जाता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उस वस्तु की कीमत बढ़ सकती है।

इससे आयात पर निर्भर देशों के लिए लागत और बढ़ जाती है। परिवहन, भंडारण और ऊर्जा लागत जुड़ने के बाद महंगी खाद्य वस्तुएं उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं। इस तरह किसी दूर देश में सूखा या बाढ़ की घटना का असर हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों की रसोई तक पहुंच सकता है।

विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि खाद्य उत्पादन को बदलते मौसम के अनुकूल बनाना जरूरी होगा। खेती के तरीकों में बदलाव, कम पानी में तैयार होने वाली फसलों का विकास, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, मौसम की सटीक जानकारी और फसलों के विविधीकरण जैसे कदम भविष्य में जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।

कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। इसका असर लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों और जेब तक पहुंच गया है। सूखा, रिकॉर्ड गर्मी, अत्यधिक बारिश और अल नीनो जैसी घटनाएं खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर रही हैं। उत्पादन कम होने का असर आपूर्ति पर पड़ता है और इसके बाद कीमतें बढ़ती हैं। कॉफी, मांस, सब्जियों, आलू और समुद्री उत्पादों में दिखाई दे रही महंगाई आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकती है।

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