नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संसदीय इतिहास में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। पार्टी के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। मौजूदा विधानसभा अंकगणित में BSP के पास उन्हें या किसी अन्य उम्मीदवार को दोबारा राज्यसभा भेजने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं हैं। यदि आगामी राज्यसभा चुनाव में कोई अप्रत्याशित राजनीतिक समीकरण नहीं बनता है तो 25 नवंबर के बाद BSP का संसद के दोनों सदनों में कोई प्रतिनिधि नहीं रहेगा। पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी थी।
यह स्थिति BSP के लिए ऐतिहासिक होगी। पार्टी ने 1989 के लोकसभा चुनाव में पहली बार संसद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। उसके बाद अलग-अलग चुनावों में उतार-चढ़ाव के बावजूद लोकसभा या राज्यसभा में उसका कम से कम एक प्रतिनिधि बना रहा। अब करीब 37 साल बाद ऐसी स्थिति बनने जा रही है जब पार्टी का न लोकसभा में कोई सांसद होगा और न ही राज्यसभा में।
रामजी गौतम हैं BSP के इकलौते सांसद
इस समय रामजी गौतम संसद में BSP के एकमात्र प्रतिनिधि हैं। उनका राज्यसभा कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है। रामजी गौतम लखीमपुर खीरी से आते हैं और लंबे समय से BSP के संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं। पार्टी प्रमुख मायावती ने उन्हें 2018 में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था और बाद में वह राष्ट्रीय समन्वयक भी रहे।
रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही BSP की राज्यसभा में मौजूदगी भी खत्म हो सकती है। उत्तर प्रदेश की जिन राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है, उनमें उनकी सीट भी शामिल है।
निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 और उत्तराखंड की एक राज्यसभा सीट के लिए 16 अक्टूबर को मतदान कराने की घोषणा की है। इनमें कई सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। मतदान के दिन ही मतगणना भी होगी।
विधानसभा में BSP का कोई विधायक नहीं
BSP के सामने सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश विधानसभा में संख्या बल की है। अगस्त में रसड़ा से BSP विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद पार्टी के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं बचा है। इसी वजह से अपने दम पर राज्यसभा उम्मीदवार को निर्वाचित कराने की स्थिति नहीं है।
मौजूदा समीकरण में भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों में आठ पर अपने उम्मीदवारों को पहुंचाने की स्थिति में है, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पास दो उम्मीदवारों को निर्वाचित कराने लायक संख्या है। हालांकि वास्तविक परिणाम उम्मीदवारों, मतदान, क्रॉस वोटिंग या किसी अन्य राजनीतिक समझ के आधार पर ही तय होगा।
इसलिए BSP का आगे राज्यसभा में प्रतिनिधित्व होगा या नहीं, इसका औपचारिक जवाब अक्टूबर के चुनाव के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा। मौजूदा संख्या के आधार पर पार्टी अपने बल पर सीट नहीं जीत सकती।
लोकसभा में पहले ही शून्य पर BSP
BSP का लोकसभा में फिलहाल कोई सांसद नहीं है। 2024 के आम चुनाव में पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे किसी भी सीट पर जीत नहीं मिली। उसका राष्ट्रीय वोट शेयर भी 2019 की तुलना में गिरा। 2019 के लोकसभा चुनाव में BSP ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़कर 10 सीटें जीती थीं। 2024 में उसका आंकड़ा शून्य हो गया।
इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भी BSP एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। इसके बावजूद उस समय पार्टी का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मौजूद था, इसलिए वह संसद से पूरी तरह बाहर नहीं हुई थी।
अब परिस्थितियां अलग हैं। लोकसभा में पहले से कोई सांसद नहीं है और राज्यसभा में मौजूद एकमात्र सदस्य का कार्यकाल भी समाप्त होने जा रहा है।
1989 में हुई थी संसद में एंट्री
कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की थी। पांच साल बाद 1989 के लोकसभा चुनाव में BSP ने पहली बार संसद में प्रवेश किया। उस चुनाव में मायावती ने बिजनौर लोकसभा सीट से जीत हासिल की थी। पार्टी के अन्य उम्मीदवार भी संसद पहुंचे और इसके बाद BSP ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया।
1990 के दशक में पार्टी उत्तर प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल हो गई। मायावती कई बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। पार्टी ने राज्यसभा में भी लगातार अपनी उपस्थिति बनाए रखी।
2007 में पूर्ण बहुमत तक पहुंची थी पार्टी
BSP के राजनीतिक सफर का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव 2007 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव था। मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं।
इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीतीं और उसे राष्ट्रीय स्तर पर 6.17 प्रतिशत वोट मिले। उस समय पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी थी।
लेकिन 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी की सीटें 206 से घटकर 80 रह गईं और वह सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद अलग-अलग चुनावों में उसके प्रदर्शन में गिरावट दर्ज की गई।
2019 में जीती थीं 10 लोकसभा सीटें
2019 के लोकसभा चुनाव में BSP ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। इस चुनाव में पार्टी ने 10 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इससे पार्टी की संसदीय मौजूदगी में एक बार फिर बढ़ोतरी हुई, लेकिन यह सुधार लंबे समय तक कायम नहीं रहा।
2024 में BSP ने किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा बने बिना चुनाव लड़ा और एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। उसका राष्ट्रीय वोट शेयर करीब 2 प्रतिशत रह गया।
2027 का विधानसभा चुनाव अहम
BSP अब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है। पार्टी संगठन को मजबूत करने और अपने पुराने सामाजिक आधार तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है। मौजूदा विधानसभा में विधायक न होने के कारण राज्यसभा में वापसी के लिए भी विधानसभा में संख्या बढ़ाना उसके लिए महत्वपूर्ण होगा।
25 नवंबर को रामजी गौतम का कार्यकाल समाप्त होने से पहले अक्टूबर में राज्यसभा चुनाव होने हैं। मौजूदा संख्या के आधार पर BSP अपने दम पर उम्मीदवार नहीं जिता सकती। यदि किसी अन्य दल के समर्थन से कोई अलग समीकरण नहीं बनता तो पार्टी 1989 के बाद पहली बार संसद के दोनों सदनों से बाहर हो जाएगी।
यह घटनाक्रम उस पार्टी के संसदीय सफर में महत्वपूर्ण मोड़ होगा जिसने कभी उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और लोकसभा में 21 सीटों तक पहुंच बनाई थी। आगे BSP की संसदीय वापसी किस तरह और कब होगी, यह आने वाले चुनावों में उसके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।