नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को लेकर न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने चंद्रचूड़ के कार्यकाल पर गंभीर सवाल उठाते हुए उन पर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की आगामी किताब Without Fear or Favour में भी चंद्रचूड़ की कार्यशैली, न्यायाधीशों की नियुक्ति और केंद्र सरकार के साथ उनके संबंधों को लेकर कई दावे सामने आए हैं। इन घटनाक्रमों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कॉलेजियम व्यवस्था और कार्यपालिका की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

हालांकि मार्कंडेय काटजू के कथित बयान की मूल रिकॉर्डिंग और उसके सटीक शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, जस्टिस कौल की किताब में किए गए दावों तथा उन पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया की पुष्टि प्रकाशित रिपोर्टों से होती है।

जस्टिस कौल ने चंद्रचूड़ की कार्यशैली पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने अपने आगामी संस्मरण में दावा किया है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ न्यायिक नियुक्तियों के मामले में केंद्र सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम रवैया अपनाते थे।

जस्टिस कौल के मुताबिक, न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले ही सरकार की राय जानने की कोशिश की जाती थी। उन्होंने इस तरीके पर आपत्ति जताई थी।

कौल ने किताब में लिखा है कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के साथ संवाद जरूर रखना चाहिए, लेकिन न्यायाधीशों की नियुक्तियों में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना भी जरूरी है।

उनका मानना है कि सरकार के साथ संबंधों में अत्यधिक नरमी दिखाने से न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।

कॉलेजियम की बैठक से जुड़ा बड़ा दावा

जस्टिस कौल ने अपनी किताब में सुप्रीम कोर्ट की छह रिक्तियों को भरने के लिए हुई एक कॉलेजियम बैठक का उल्लेख किया है।

उनके अनुसार, पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। इसी दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने एक अन्य उम्मीदवार का नाम सामने रखा और इस संबंध में सरकार की राय जानने के लिए संपर्क करने का विचार व्यक्त किया।

कौल का कहना है कि उन्होंने इस प्रक्रिया का विरोध किया, क्योंकि कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले सरकारी सहमति जानना उचित नहीं था।

उन्होंने एक अन्य प्रसंग का भी उल्लेख किया, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले एक न्यायाधीश उम्मीदवार की पारिवारिक जाति को लेकर सरकार की ओर से सवाल पूछे जाने का दावा किया गया है।

जस्टिस कौल ने इसे अनुचित बताते हुए विरोध दर्ज कराने और बैठक छोड़कर जाने का उल्लेख किया है। हालांकि ये घटनाएं उनके संस्मरण में दर्ज उनका पक्ष हैं।

चंद्रचूड़ ने आरोपों पर दिया जवाब

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस कौल के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने अभी उनकी किताब नहीं पढ़ी है। ऐसे में पूरे संदर्भ को जाने बिना विस्तृत टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

चंद्रचूड़ ने कहा कि उनके मुख्य न्यायाधीश रहते कॉलेजियम की बैठकें सम्मानजनक और सौहार्दपूर्ण वातावरण में होती थीं।

उन्होंने यह भी बताया कि जस्टिस कौल के साथ उनके संबंध अच्छे रहे और न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित सिफारिशें आपसी सहमति से तैयार की गई थीं।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, उन्हें ऐसी कोई घटना याद नहीं है जिसमें जस्टिस कौल कॉलेजियम की बैठक छोड़कर चले गए हों।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की संवैधानिक भूमिका होती है और सरकार तथा मुख्य न्यायाधीश के बीच संवाद अपने आप में असामान्य नहीं है।

PMLA मामले को लेकर भी विवाद

जस्टिस कौल ने अपने संस्मरण में धनशोधन निवारण अधिनियम यानी पीएमएलए से जुड़े एक मामले का भी उल्लेख किया है।

उनके मुताबिक, उनकी अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए एक फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार का सवाल आया था।

उन्होंने दावा किया कि बाद में यह मामला उन्हें बताए बिना दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया गया।

जस्टिस कौल ने इस घटनाक्रम को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि किसी मामले को एक पीठ से दूसरी पीठ में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

इस दावे से भी संवेदनशील मामलों की सुनवाई और मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक शक्तियों पर चर्चा शुरू हुई है।

कांग्रेस ने भी उठाए गंभीर सवाल

जस्टिस कौल की किताब के अंश सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार और न्यायपालिका के संबंधों को लेकर सवाल उठाए हैं।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 25 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किताब में सामने आए दावे न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े गंभीर प्रश्न पैदा करते हैं।

उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कथित सरकारी हस्तक्षेप, कॉलेजियम से पहले विचार-विमर्श और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ में बदलाव के मुद्दों को उठाया।

कांग्रेस का कहना है कि संविधान की रक्षा करने वाली संस्थाओं को सत्ता के दबाव से स्वतंत्र रहना चाहिए।

हालांकि जस्टिस कौल के दावों को सरकार के अनुचित हस्तक्षेप का स्थापित प्रमाण मानना अभी उचित नहीं होगा। इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग पक्षों के विवरण सामने आए हैं।

क्या है कॉलेजियम व्यवस्था?

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम व्यवस्था लागू है।

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। यह व्यवस्था उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित सिफारिशें करती है।

नियुक्ति प्रक्रिया में केंद्र सरकार की भी निर्धारित भूमिका होती है। हालांकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कॉलेजियम की निर्णय प्रक्रिया को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और नियुक्तियों में होने वाली देरी को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर फिर छिड़ी बहस

पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ नवंबर 2022 से नवंबर 2024 तक देश के मुख्य न्यायाधीश रहे। उनके कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई हुई।

अब जस्टिस कौल की आगामी किताब और पूर्व न्यायाधीशों की आलोचनात्मक टिप्पणियों के बीच उनके प्रशासनिक फैसलों पर नई चर्चा शुरू हो गई है।

यह विवाद केवल किसी एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका और सरकार के बीच संवैधानिक संतुलन से भी जुड़ा है।

फिलहाल जस्टिस कौल के आरोपों और पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के जवाब में महत्वपूर्ण अंतर मौजूद है। ऐसे में इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय सभी पक्षों और उपलब्ध अभिलेखों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

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