नई दिल्ली। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, किफायती और आधुनिक बनाने के लिए युवा इनोवेटर लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), स्मार्टफोन और पहनने योग्य स्मार्ट डिवाइस की मदद से ऐसी तकनीकें विकसित की जा रही हैं, जो मरीजों की जांच और बीमारियों की शुरुआती पहचान में मदद कर सकती हैं। आंखों की गंभीर बीमारियों की स्क्रीनिंग से लेकर गठिया के मरीजों की सहायता के लिए वियरेबल तकनीक तक, भारतीय स्टार्टअप स्वास्थ्य क्षेत्र में नए समाधान तलाश रहे हैं।इसी दिशा में बेंगलुरु स्थित डीप-टेक स्टार्टअप रेमिडियो (Remidio) ने एक पोर्टेबल रेटिनल इमेजिंग डिवाइस विकसित किया है। यह स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से आंखों की जांच करने तथा ग्लूकोमा और डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी बीमारियों की शुरुआती पहचान में सहायता करता है। इस तकनीक का उद्देश्य उन क्षेत्रों तक आंखों की जांच की सुविधा पहुंचाना है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर और आधुनिक चिकित्सा उपकरण आसानी से उपलब्ध नहीं होते।
स्मार्टफोन से होगी आंखों की स्क्रीनिंग
रेमिडियो का पोर्टेबल उपकरण आंख के रेटिना की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने में सक्षम है। इन तस्वीरों का विश्लेषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सॉफ्टवेयर के जरिए किया जाता है।यह तकनीक डायबिटिक रेटिनोपैथी, ग्लूकोमा और उम्र से संबंधित मैक्यूलर डिजनरेशन जैसी आंखों की समस्याओं के शुरुआती संकेतों की पहचान करने में मदद कर सकती है।कंपनी के अनुसार, उसके Insta FOP NM10 उपकरण में स्मार्टफोन आधारित इमेजिंग और एआई स्क्रीनिंग की सुविधा उपलब्ध है। यह उपकरण हल्का और पोर्टेबल है, जिससे अस्पतालों के अलावा स्वास्थ्य शिविरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
डायबिटीज के मरीजों को मिल सकता है लाभ
मधुमेह से पीड़ित लोगों में आंखों से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटिक रेटिनोपैथी ऐसी स्थिति है, जिसमें लंबे समय तक बढ़ा हुआ ब्लड शुगर आंखों की रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।समय पर जांच और उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी दृष्टि को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।एआई आधारित रेटिनल स्क्रीनिंग तकनीक की मदद से संभावित समस्या का शुरुआती संकेत मिल सकता है। इससे मरीज को समय रहते नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास भेजने में सुविधा होती है।हालांकि, एआई स्क्रीनिंग को विशेषज्ञ डॉक्टर की विस्तृत जांच और अंतिम निदान का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
गठिया मरीजों के लिए वियरेबल तकनीक
आंखों की जांच के अलावा स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में गठिया यानी आर्थराइटिस के मरीजों की सहायता के लिए भी पहनने योग्य उपकरणों पर काम किया जा रहा है।ऐसे स्मार्ट उपकरण शरीर की गतिविधियों, जोड़ों की गति और शारीरिक स्थिति से संबंधित जानकारी दर्ज करने के लिए सेंसर का उपयोग कर सकते हैं।इस प्रकार की तकनीक का उद्देश्य मरीजों और चिकित्सकों को गतिविधियों की निगरानी में सहायता प्रदान करना है। इससे पुनर्वास कार्यक्रमों और निर्धारित व्यायाम के दौरान उपयोगी जानकारी मिल सकती है।हालांकि, किसी विशिष्ट भारतीय स्टार्टअप के गठिया संबंधी वियरेबल उपकरण के नाम, चिकित्सकीय परीक्षण या व्यावसायिक उपलब्धता की पुष्टि इस जानकारी में नहीं हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच सकती है आधुनिक जांच
भारत में कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में विशेषज्ञ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। ऐसे क्षेत्रों में पोर्टेबल चिकित्सा उपकरण उपयोगी साबित हो सकते हैं।रेमिडियो के अनुसार, उसके उपकरण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों और दूरस्थ चिकित्सा सेवाओं में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।कंपनी अपनी तकनीक के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं को बड़े अस्पतालों से बाहर छोटे चिकित्सा केंद्रों और समुदायों तक पहुंचाने पर ध्यान दे रही है।
55 से अधिक देशों में पहुंची भारतीय तकनीक
रेमिडियो की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कंपनी की तकनीक 55 से अधिक देशों में इस्तेमाल की जा चुकी है और 1.6 करोड़ से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग या स्वास्थ्य जांच में योगदान दे चुकी है।कंपनी का दावा है कि उसकी एआई आधारित तकनीक आंखों की बीमारियों की शुरुआती पहचान को अधिक सुलभ बनाने में मदद कर रही है।
स्वास्थ्य सेवाओं में बढ़ेगी AI की भूमिका
स्वास्थ्य तकनीक में तेजी से हो रहे नवाचार आने वाले समय में मरीजों की जांच, बीमारी की निगरानी और चिकित्सकों के निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बना सकते हैं।विशेषज्ञों के लिए ऐसी तकनीकों की सटीकता, मरीजों के डेटा की सुरक्षा और चिकित्सकीय उपयोगिता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है।भारतीय इनोवेटरों के ये प्रयास दिखाते हैं कि स्मार्टफोन, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग केवल डिजिटल सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके जरिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की भी संभावनाएं मौजूद हैं।