नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने एथेनॉल उत्पादन को लेकर एक और महत्वपूर्ण फैसला लिया है। गन्ने के रस और चीनी से जुड़े कुछ उत्पादों से एथेनॉल की खरीद पर प्रतिबंध लगाने के बाद अब सरकार ने चावल और क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से बनने वाले एथेनॉल की मात्रा भी सीमित कर दी है। इस फैसले से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियों की निर्भरता मक्के पर बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। उद्योग जगत के अनुमानों के अनुसार, एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में इसके उत्पादन के लिए मक्के की मांग करीब 1.6 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। मौजूदा आपूर्ति वर्ष में यह मांग लगभग 1.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है। ऐसे में मक्के की मांग करीब 23 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

सरकार के इस कदम को खाद्य सुरक्षा और जैव ईंधन उत्पादन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। देश में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने की योजना को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी मात्रा में एथेनॉल की जरूरत होती है। अब तक इसके उत्पादन में गन्ना, शीरा, मक्का, चावल और अन्य अनाजों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और कीमतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के इस्तेमाल से जुड़ी शर्तों में बदलाव किया है।

जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने भारतीय खाद्य निगम यानी एफसीआई के अधिशेष चावल से बनने वाले एथेनॉल की मात्रा पर सीमा निर्धारित कर दी है। संशोधित निविदा शर्तों के तहत आपूर्ति वर्ष 2026-27 की पहली तीन तिमाहियों में एफसीआई के अतिरिक्त चावल से अधिकतम 324 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन निर्धारित किया गया है। इसके लिए करीब 72 लाख टन अधिशेष चावल उपलब्ध कराने का प्रावधान है।

इसके अलावा क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से बनने वाले एथेनॉल पर भी अलग सीमा तय की गई है। सरकार ने इस श्रेणी के लिए पूरे आपूर्ति वर्ष में अधिकतम 160 करोड़ लीटर एथेनॉल की सीमा निर्धारित की है। इस तरह अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग कच्चे माल के लिए निर्धारित सीमा के भीतर ही आपूर्ति की जा सकेगी।

इससे पहले केंद्र सरकार ने एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 के लिए गन्ने के रस, चीनी सिरप और बी-हेवी शीरे से तैयार एथेनॉल की खरीद रोकने का फैसला किया था। हालांकि, सी-हेवी शीरे से बनने वाले एथेनॉल को खरीद व्यवस्था में शामिल रखा गया है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना और कीमतों पर संभावित दबाव को नियंत्रित करना है।

देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में प्रतिकूल मौसम और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के कारण चीनी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। ऐसे में सरकार ने चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने के लिए गन्ने से जुड़े कुछ कच्चे माल का एथेनॉल में इस्तेमाल सीमित करने की नीति अपनाई है।

गन्ने और चावल पर प्रतिबंध तथा सीमाएं लागू होने के बाद एथेनॉल कंपनियों के सामने मक्का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरा है। मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों की मांग आने वाले महीनों में बढ़ सकती है। इससे मक्का उत्पादक किसानों, व्यापारियों और अनाज की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के लिए नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मक्के की बढ़ती मांग का असर अन्य उद्योगों पर भी पड़ सकता है। मक्का केवल एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि पोल्ट्री उद्योग, डेयरी क्षेत्र, पशु आहार और स्टार्च निर्माण में भी इसकी बड़ी भूमिका है।

विशेष रूप से पोल्ट्री उद्योग में मक्का पशु आहार का महत्वपूर्ण घटक है। यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की खरीद तेजी से बढ़ती है, तो बाजार में उपलब्ध आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में पोल्ट्री फार्म संचालकों और पशु आहार निर्माताओं को अधिक कीमत पर मक्का खरीदना पड़ सकता है।

डेयरी और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी इस बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं। मक्के की कीमतों में संभावित वृद्धि का असर उत्पादन लागत पर पड़ सकता है। हालांकि, कीमतों में वास्तविक बदलाव फसल उत्पादन, बाजार में उपलब्ध भंडार, आयात-निर्यात की स्थिति और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा।

एथेनॉल उद्योग के लिए मक्के की मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर बाजार मिलने की संभावना भी है। यदि खरीद बढ़ती है और किसानों को उचित मूल्य मिलता है, तो मक्का उत्पादन अधिक लाभकारी बन सकता है। आने वाले वर्षों में कुछ क्षेत्रों में किसानों की फसल चयन संबंधी प्राथमिकताओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, उत्पादन में कमी या मौसम संबंधी नुकसान होने की स्थिति में बढ़ती मांग बाजार में असंतुलन पैदा कर सकती है। ऐसे में सरकार के लिए मक्का उत्पादन बढ़ाने, उत्पादकता सुधारने और आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने की चुनौती भी महत्वपूर्ण होगी।

उद्योग जगत के अनुमानों के मुताबिक, एक टन मक्के से लगभग 380 लीटर एथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इस आधार पर 1.6 करोड़ टन मक्के का उपयोग होने पर करीब 608 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन संभव है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन कच्चे माल की गुणवत्ता, प्रसंस्करण तकनीक और संयंत्रों की क्षमता पर निर्भर करेगा।

पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाना भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करना, जैव ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और घरेलू कृषि संसाधनों का उपयोग करना है।

वर्ष 2026-27 के लिए तेल विपणन कंपनियों ने करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद के लिए निविदा जारी की है। यह मांग पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई है। ऐसे में विभिन्न स्रोतों से पर्याप्त एथेनॉल उपलब्ध कराना उद्योग के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

सरकार के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है। एक ओर एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को जारी रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर खाद्यान्न, चीनी और पशु आहार के लिए आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मक्का आधारित एथेनॉल की मांग तेजी से बढ़ती है, तो देश में इस फसल की उत्पादकता और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना जरूरी होगा। इसके लिए उन्नत बीज, बेहतर सिंचाई, भंडारण सुविधाओं और किसानों को बाजार से जोड़ने वाली व्यवस्थाओं पर ध्यान देना होगा।

फिलहाल सरकार के नए फैसले के बाद एथेनॉल उद्योग की नजर मक्के की उपलब्धता और बाजार की कीमतों पर टिकी है। आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा कि उत्पादन कंपनियां नए नियमों के अनुसार अपनी कच्चे माल की जरूरत किस तरह पूरी करती हैं।

एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की अनुमानित मांग 1.3 करोड़ टन से बढ़कर 1.6 करोड़ टन पहुंचने की संभावना ने कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में नई चर्चा शुरू कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बढ़ती मांग का लाभ किसानों तक कितना पहुंचता है और पोल्ट्री, डेयरी तथा अन्य उद्योगों पर इसका कितना असर पड़ता है।

Tags: