नई दिल्ली। भारत के युवा वैज्ञानिक और इनोवेटर आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे हैं। बिना ड्राइवर के सड़कों पर चलने वाली कारों से लेकर मंगल ग्रह के वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करने वाली अत्याधुनिक बैटरियों तक, भारतीय शोधकर्ता भविष्य की तकनीकों को विकसित करने में जुटे हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित स्टार्टअप 'स्वायत्त रोबॉट्स' ऑटोनॉमस ड्राइविंग तकनीक विकसित कर रहा है, जबकि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) हैदराबाद के वैज्ञानिक मंगल ग्रह पर उपयोगी हो सकने वाली कार्बन डाइऑक्साइड आधारित बैटरी पर शोध कर रहे हैं।इन दोनों परियोजनाओं का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जो भविष्य में परिवहन व्यवस्था और अंतरिक्ष अभियानों के लिए उपयोगी साबित हो सके। हालांकि, दोनों तकनीकें अभी विकास और परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं।
बिना ड्राइवर के सड़क पर चल सकेगी कार
भोपाल स्थित स्वायत्त रोबॉट्स ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें वाहन बिना लगातार मानवीय नियंत्रण के सड़क पर चल सकेगा। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, कैमरे और सेंसर का इस्तेमाल किया जा रहा हैवाहनों में लगे सेंसर आसपास की सड़कों, अन्य वाहनों, पैदल यात्रियों और संभावित बाधाओं की जानकारी एकत्र करते हैं। इसके बाद कंप्यूटर सिस्टम इन आंकड़ों का विश्लेषण कर वाहन को आगे बढ़ाने, मोड़ने, गति नियंत्रित करने और बाधाओं से बचाने में मदद करता है।कंपनी का लक्ष्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जिसे अलग-अलग प्रकार के वाहनों में इस्तेमाल किया जा सके।
कठिन परिस्थितियों में भी तकनीक का परीक्षण
स्वायत्त रोबॉट्स ने अपनी तकनीक के परीक्षण के दौरान कई चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में वाहनों को संचालित करने के प्रदर्शन किए हैं।कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, इसका ऑटोनॉमस नेविगेशन सिस्टम सड़कों के साथ बिना पक्के रास्तों पर भी काम करने के लिए विकसित किया जा रहा है।कंपनी ने जनवरी 2026 में बिना सुरक्षा चालक के ऑफ-रोड ऑटोनॉमस ड्राइविंग का प्रदर्शन करने की जानकारी भी साझा की थी।इस तकनीक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से वाहन अपने आसपास की परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेता है।
IIT हैदराबाद के वैज्ञानिकों का अनोखा प्रयोग
दूसरी ओर, IIT हैदराबाद के शोधकर्ता अंतरिक्ष अभियानों के लिए विशेष बैटरी तकनीक विकसित कर रहे हैं। इसका उद्देश्य मंगल ग्रह के वातावरण में प्रचुर मात्रा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग ऊर्जा भंडारण प्रणाली में करना है।संस्थान की कार्बन प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने लिथियम-कार्बन डाइऑक्साइड बैटरी का प्रायोगिक मॉडल विकसित किया है। इस बैटरी का परीक्षण मंगल ग्रह जैसी कृत्रिम गैसीय परिस्थितियों में किया गया है।शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में इस तकनीक का उपयोग मंगल ग्रह पर भेजे जाने वाले रोवर और लैंडर जैसे अंतरिक्ष उपकरणों में किया जा सकता है।यह शोध प्रोफेसर चंद्रशेखर शर्मा के नेतृत्व में विकसित की जा रही मेटल-कार्बन डाइऑक्साइड बैटरी तकनीक से संबंधित है। यह पूरी तरह धातु-मुक्त बैटरी नहीं है, क्योंकि इसके प्रयोगात्मक स्वरूप में लिथियम जैसी धातु का इस्तेमाल होता है।
मंगल ग्रह पर क्यों महत्वपूर्ण होगी यह बैटरी?
मंगल ग्रह का वातावरण मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड से बना हुआ है। वैज्ञानिक इसी उपलब्ध गैस का इस्तेमाल ऊर्जा भंडारण प्रणाली में करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।सामान्य अंतरिक्ष अभियानों में पृथ्वी से बैटरियां और अन्य ऊर्जा उपकरण भेजने पड़ते हैं। इनका वजन और आकार अंतरिक्ष यान की लागत तथा क्षमता को प्रभावित करता है।यदि भविष्य में कार्बन डाइऑक्साइड आधारित बैटरियां व्यावहारिक रूप से सफल होती हैं, तो अंतरिक्ष अभियानों में उपकरणों का वजन कम करने और ऊर्जा घनत्व बढ़ाने में मदद मिल सकती है।IIT हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह जैसी परिस्थितियों में बैटरी की कार्यक्षमता का प्रारंभिक प्रदर्शन किया है। हालांकि, वास्तविक अंतरिक्ष अभियान में इसके उपयोग से पहले और तकनीकी परीक्षण आवश्यक होंगे।
पृथ्वी के पर्यावरण के लिए भी उपयोगी हो सकता है शोध
वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन डाइऑक्साइड आधारित बैटरी तकनीक का उपयोग भविष्य में पृथ्वी पर भी किया जा सकता है।इससे कार्बन डाइऑक्साइड के उपयोग और ऊर्जा भंडारण के नए रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए बैटरी की क्षमता, लागत, सुरक्षा और लंबे समय तक काम करने की विश्वसनीयता में सुधार करना जरूरी है।IIT हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने बैटरी की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इलेक्ट्रोड और अन्य घटकों में सुधार पर भी काम किया है।
भविष्य की तकनीक में भारत की बढ़ती भागीदारी
भोपाल और हैदराबाद में चल रहे ये प्रयोग भारत के तकनीकी अनुसंधान और नवाचार की संभावनाओं को दर्शाते हैं।एक ओर स्वायत्त वाहन तकनीक परिवहन व्यवस्था को अधिक उन्नत बनाने की दिशा में काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर कार्बन डाइऑक्साइड आधारित बैटरी अंतरिक्ष अभियानों के लिए ऊर्जा भंडारण का नया विकल्प बन सकती है।विशेषज्ञों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इन तकनीकों को प्रयोगशाला और नियंत्रित परीक्षणों से आगे बढ़ाकर वास्तविक परिस्थितियों में सुरक्षित तथा विश्वसनीय बनाना है।यदि इन परियोजनाओं के आगामी परीक्षण सफल होते हैं, तो भारतीय शोध और नवाचार भविष्य की परिवहन व्यवस्था तथा अंतरिक्ष अन्वेषण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।