नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में जारी तनाव और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर मंडरा रहे संकट के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में जुटा है। अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदने वाले भारत के लिए आपूर्ति में किसी भी प्रकार की बाधा गंभीर चुनौती बन सकती है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की उपलब्धता, महंगाई, परिवहन लागत और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसी खतरे को देखते हुए सरकार रणनीतिक कच्चे तेल के भंडार की क्षमता बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक संसद की स्थायी समिति ने सरकार से रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व से संबंधित परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने के लिए कहा है। समिति ने टेंडर प्रक्रिया में तेजी लाने, भूमि से संबंधित मंजूरियों को समय पर पूरा करने और वित्तीय अड़चनों का समाधान करने की सिफारिश की है। इसके साथ ही परियोजनाओं के लिए आवंटित बजट का बेहतर तरीके से उपयोग करने पर जोर दिया गया है।
रणनीतिक भंडार से 9.5 दिनों की जरूरत पूरी
भारत के पास वर्तमान में 5.33 मिलियन मीट्रिक टन क्षमता का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार मौजूद है। ये रिजर्व आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम और कर्नाटक के मंगलुरु एवं पाडूर में निर्मित भूमिगत भंडारण केंद्रों में रखे गए हैं। इन सुविधाओं का संचालन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड करती है।
इस रणनीतिक भंडार की मदद से भारत करीब 9.5 दिनों की कच्चे तेल की जरूरत पूरी कर सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में आपूर्ति बाधित होने के बाद केवल साढ़े नौ दिनों तक ही तेल उपलब्ध रहेगा। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के अलावा देश की सरकारी तेल कंपनियों, रिफाइनरियों और आपूर्ति व्यवस्था के पास भी कच्चे तेल तथा तैयार पेट्रोलियम उत्पादों का व्यावसायिक स्टॉक मौजूद रहता है।
कुल 74 दिनों का तेल बफर
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार रणनीतिक रिजर्व से लगभग 9.5 दिनों की आयात जरूरत पूरी हो सकती है। सरकारी तेल कंपनियों के पास मौजूद व्यावसायिक भंडार से करीब 64.5 दिनों की अतिरिक्त आवश्यकता पूरी की जा सकती है। दोनों तरह के भंडार को मिला दिया जाए तो भारत के पास कुल लगभग 74 दिनों का तेल बफर उपलब्ध है।
इसके बावजूद देश का तेल भंडार अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के निर्धारित 90 दिनों के मानक से करीब 16 दिन कम है। यही कारण है कि सरकार रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने की परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रही है। नई भंडारण सुविधाएं तैयार होने से आपात स्थिति के दौरान देश के पास अधिक समय तक तेल की आपूर्ति बनाए रखने की क्षमता होगी।
समुद्री मार्गों पर संकट बड़ी चुनौती
भारत के लिए तेल आयात के लिहाज से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इस क्षेत्र में सैन्य तनाव, समुद्री नाकेबंदी या जहाजों की आवाजाही बाधित होने पर तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसके अलावा भारत तक कच्चा तेल पहुंचने में देरी या आपूर्ति में कमी भी आ सकती है।
कच्चे तेल के महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है। इससे रुपये पर दबाव पड़ने के साथ पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, उर्वरक और परिवहन की लागत प्रभावित हो सकती है। ईंधन महंगा होने का असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई देता है।
रणनीतिक तेल भंडार ऐसी आपात स्थितियों में सुरक्षा कवच की भूमिका निभाते हैं। वैश्विक बाजार से तेल की आपूर्ति रुकने या कीमतों में अचानक भारी उछाल आने पर सरकार इन भंडारों का इस्तेमाल कर सकती है। इससे घरेलू बाजार में कुछ समय तक ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों पर पड़ने वाले दबाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। भविष्य की जरूरतों और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए भारत के लिए 90 दिनों या उससे अधिक का तेल भंडार तैयार करना ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।