मुंबई: नवरात्रि 2025 और नवरात्रि 2026 के बीच भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए साल मुश्किल भरा रहा। ग्लोबल इकोनॉमिक और जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं ने घरेलू ग्रोथ के बुनियादी कारकों पर असर डाला और बेंचमार्क इंडेक्स को नीचे खींच लिया।
इस दौरान निफ्टी इंडेक्स में 11% की गिरावट आई। घरेलू इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) के लगातार सपोर्ट और मजबूत इकोनॉमिक ग्रोथ के बावजूद, इसके ज़्यादातर स्टॉक्स नेगेटिव ज़ोन में बंद हुए।
मार्केट में आई इस कमजोरी के लिए मुख्य रूप से बाहरी वजहों को जिम्मेदार ठहराया गया, जिनमें जियोपॉलिटिकल तनाव का बढ़ना, US-ईरान संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, रुपये का कमजोर होना, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में वृद्धि और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) की लगातार बिकवाली शामिल हैं।
फॉरेन इन्वेस्टर्स ने 2025 में 1.66 लाख करोड़ रुपये की नेट आउटफ्लो के बाद, 2026 में अब तक 3.04 लाख करोड़ रुपये के भारतीय इक्विटी शेयर बेचे हैं, जिससे मार्केट सेंटीमेंट पर दबाव बढ़ा है।
डेटा से पता चला है कि इस दौरान निफ्टी इंडेक्स के 31 स्टॉक्स ने नेगेटिव रिटर्न दिया। ITC, टाटा मोटर्स PV, इंफोसिस, जियो फाइनेंशियल सर्विसेज और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले स्टॉक्स में शामिल रहे, जिनमें से हर एक में 30% से ज़्यादा की गिरावट आई।
अन्य प्रमुख पिछड़ने वाले स्टॉक्स में HDFC लाइफ इंश्योरेंस, मारुति सुजुकी, HDFC बैंक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, मैक्स हेल्थकेयर और महिंद्रा एंड महिंद्रा शामिल थे, जिनमें 22% से 29% के बीच गिरावट आई। कुल मिलाकर, साल के दौरान निफ्टी के लगभग 20 स्टॉक्स में 12% से ज़्यादा की गिरावट आई।
हालांकि, कुछ स्टॉक्स ने मार्केट के आम ट्रेंड के उलट प्रदर्शन किया। श्रीराम फाइनेंस सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला स्टॉक बनकर उभरा, जिसमें दोनों नवरात्रि अवधियों के बीच लगभग 49% की बढ़त हुई।
टाइटन कंपनी, अडानी पोर्ट्स और हिंडाल्को इंडस्ट्रीज में 21% से 27% के बीच बढ़त हुई, जबकि नेस्ले इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और एक्सिस बैंक में 10% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई।
एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि निकट भविष्य में मार्केट एक दायरे में रहेगा क्योंकि इन्वेस्टर्स कच्चे तेल की कीमतों और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड पर नज़र बनाए हुए हैं। हालांकि दूसरी तिमाही में कॉर्पोरेट अर्निंग्स के अच्छे रहने की उम्मीद है, लेकिन जानकारों का मानना ​​है कि मैक्रो-इकोनॉमिक चिंताएं मार्केट में किसी भी लगातार रैली को सीमित कर सकती हैं।
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