नई दिल्ली: एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के शुरुआती नौ महीनों में घरेलू कंपनियों ने IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) के ज़रिए रिकॉर्ड $12.5 बिलियन जुटाए हैं, जबकि इक्विटी मार्केट में बिकवाली का दबाव देखा गया और निफ्टी में लगभग 14 प्रतिशत की गिरावट आई।
LSEG के विश्लेषण के अनुसार, 1980 में रिकॉर्ड रखने की शुरुआत के बाद से जनवरी-सितंबर की अवधि में जुटाई गई यह रकम सबसे ज़्यादा है।
हालांकि, डेटा से पता चलता है कि IPO की संख्या पिछले साल के 268 से 17.9 प्रतिशत घटकर 220 रह गई, लेकिन इससे मिलने वाली रकम में 11.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
औसत इश्यू साइज़ $42 मिलियन से बढ़कर लगभग $57 मिलियन हो गया।
कुल IPO से मिली रकम का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा कुछ बड़े IPO से आया।
इसके अलावा, रिपोर्ट के अनुसार, अकेले सितंबर में 34 मेनबोर्ड IPO से 39,380 करोड़ रुपये जुटाए गए, जो 2026 का सबसे ज़्यादा मासिक आंकड़ा है।
हालांकि, कुल रकम का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा 'ऑफर फॉर सेल' (मौजूदा शेयरधारकों द्वारा शेयर बेचना) से आया, जिसका मतलब है कि ज़्यादातर पैसा कंपनियों के बजाय मौजूदा शेयरधारकों को मिला।
IPO में आई तेज़ी, इक्विटी के ज़रिए फंड जुटाने की व्यापक सुस्ती के उलट थी।
फॉलो-ऑन ऑफरिंग और ब्लॉक सेल सहित इक्विटी कैपिटल मार्केट से मिलने वाली कुल रकम सालाना आधार पर 1.7 प्रतिशत गिरकर तीन साल के निचले स्तर $40.8 बिलियन पर आ गई।
जनवरी-सितंबर के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा अनुमानित 2.7 लाख करोड़ रुपये से 3 लाख करोड़ रुपये मूल्य के भारतीय शेयर बेचे जाने के बावजूद, घरेलू लिक्विडिटी ने IPO मार्केट को सहारा दिया।
हालांकि, लिस्टिंग से होने वाले मुनाफ़े में कमी के संकेत दिखे। औसत लिस्टिंग प्रीमियम अगस्त के 24.4 प्रतिशत से गिरकर सितंबर में 15.1 प्रतिशत हो गया, जबकि मीडियन 21.3 प्रतिशत से घटकर 5.9 प्रतिशत रह गया।
इन्वेस्टमेंट बैंकों के नतीजे मिले-जुले रहे। इक्विटी अंडरराइटिंग फीस 9 प्रतिशत गिरकर $415.6 मिलियन हो गई, जबकि M&A (मर्जर और एक्विजिशन) एडवाइज़री गतिविधियों में तेज़ी के कारण कुल इन्वेस्टमेंट बैंकिंग फीस 2 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड $1.1 बिलियन हो गई। इसके अलावा, 130 से ज़्यादा कंपनियों के पास IPO के लिए SEBI की मंज़ूरी है। आने वाले महीनों में यह पता चलेगा कि क्या कमज़ोर मार्केट रिटर्न के बीच घरेलू लिक्विडिटी नई लिस्टिंग को सपोर्ट करती रहेगी।