नई दिल्ली: खाद्य पदार्थों और पोषण से जुड़े उत्पादों के विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने दो प्रमुख कंपनियों को नोटिस जारी किया है। इनमें नेस्ले इंडिया और जायडस वेलनेस शामिल हैं। नेस्ले इंडिया को उसके शिशु आहार उत्पाद ‘लैक्टोजेन प्रो 1’ में मौजूद व्हे प्रोटीन के आसानी से पचने संबंधी दावे पर नोटिस भेजा गया है। वहीं, कॉम्प्लान ब्रांड से जुड़े जायडस वेलनेस को ‘2X तेजी से विकास’ के दावे के संबंध में जवाब देने को कहा गया है। नियामक ने इन दावों के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण मांगे हैं।
इस कार्रवाई के बाद पैकेज्ड फूड, शिशु आहार और पोषण संबंधी उत्पादों के विज्ञापनों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर एक बार फिर ध्यान गया है। कंपनियां अपने उत्पादों की विशेषताओं को बताने के लिए कई तरह के दावे करती हैं, लेकिन ऐसे दावों का आधार विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण होना जरूरी है। खासकर जब बात बच्चों के पोषण, पाचन और शारीरिक विकास से जुड़े उत्पादों की हो, तब उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली जानकारी का सही और स्पष्ट होना महत्वपूर्ण हो जाता है।
लैक्टोजेन प्रो 1 के किस दावे पर सवाल?
नेस्ले इंडिया का ‘लैक्टोजेन प्रो 1’ शिशुओं के लिए बनाया गया फॉर्मूला आहार है। इस उत्पाद से संबंधित एक दावे में कहा गया है कि इसमें मौजूद व्हे प्रोटीन आसानी से पच जाता है। FSSAI ने इसी दावे के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण मांगे हैं।
व्हे प्रोटीन दूध में पाया जाने वाला प्रोटीन है। इसका इस्तेमाल कई खाद्य और पोषण उत्पादों में किया जाता है। हालांकि, किसी प्रोटीन के सामान्य गुणों और किसी विशेष उत्पाद के बारे में किए गए दावे में अंतर होता है। किसी उत्पाद में मौजूद सामग्री के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उससे जुड़ा हर दावा अपने आप प्रमाणित हो जाता है।
नियामक की ओर से मांगे गए वैज्ञानिक प्रमाणों के जरिए यह स्पष्ट करने की कोशिश की जा सकती है कि उत्पाद के बारे में किया गया दावा किस आधार पर है और क्या उपलब्ध साक्ष्य उसका समर्थन करते हैं। फिलहाल नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि कंपनी का दावा गलत साबित हो गया है। इसके लिए कंपनी का जवाब, उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़े और नियामक की आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
जायडस वेलनेस के ‘2X तेजी से विकास’ दावे पर भी नोटिस
FSSAI ने जायडस वेलनेस को भी नोटिस जारी किया है। कंपनी के कॉम्प्लान ब्रांड से जुड़े ‘2X तेजी से विकास’ के दावे पर सवाल उठाए गए हैं। नियामक ने इस दावे को साबित करने के लिए वैज्ञानिक आधार मांगा है।
बच्चों की लंबाई और शारीरिक विकास माता-पिता की आनुवंशिक विशेषताओं, पोषण, नींद, शारीरिक गतिविधियों और समग्र स्वास्थ्य सहित कई कारकों पर निर्भर करता है। ऐसे में किसी पेय या पोषण उत्पाद को लेकर यदि तेजी से विकास का दावा किया जाता है, तो यह समझना जरूरी है कि उस दावे का आधार क्या है और उसमें किन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है।
‘2X तेजी से विकास’ जैसे वाक्य उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। लेकिन उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि इस तरह के दावे किस वैज्ञानिक अध्ययन, तुलना या अन्य प्रमाणों पर आधारित हैं। केवल विज्ञापन में किसी बात को प्रमुखता से दिखा देना उसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं करता।
हालांकि, जायडस वेलनेस के मामले में भी नोटिस को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। कंपनी की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाणों और FSSAI के मूल्यांकन के बाद ही दावे के संबंध में स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।
खाद्य उत्पादों के दावों पर क्यों जरूरी है निगरानी?
FSSAI देश में खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और उनसे जुड़े नियामकीय मानकों की निगरानी करने वाली प्रमुख संस्था है। खाद्य उत्पादों के लेबल और विज्ञापनों में दी गई जानकारी उपभोक्ताओं के खरीदारी संबंधी फैसलों को प्रभावित करती है। इसलिए पोषण, स्वास्थ्य लाभ, पाचन और शारीरिक विकास से जुड़े दावों का विश्वसनीय होना जरूरी है।
यदि किसी उत्पाद को लेकर कोई विशेष लाभ बताया जाता है, तो उपभोक्ता यह मान सकते हैं कि उस लाभ के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं। बच्चों के लिए खरीदे जाने वाले उत्पादों के मामले में यह पहलू और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों की सेहत और विकास को ध्यान में रखकर निर्णय लेते हैं।
वैज्ञानिक प्रमाण मांगने की प्रक्रिया का उद्देश्य यह जांचना है कि किसी दावे को तथ्यात्मक आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है या नहीं। इससे कंपनियों को अपने विज्ञापनों और पैकेजिंग पर लिखी जानकारी के समर्थन में उचित दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता भी रेखांकित होती है।
उपभोक्ताओं को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
विशेषज्ञों की सलाह के अनुरूप उपभोक्ताओं को खाद्य और पोषण उत्पाद खरीदते समय केवल विज्ञापनों के आकर्षक दावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उत्पाद का लेबल, सामग्री, पोषण संबंधी जानकारी, उपयोग के निर्देश और संबंधित आयु वर्ग की जरूरतों को समझना जरूरी है।
शिशु आहार के मामले में माता-पिता को डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए। किसी उत्पाद के बारे में किया गया दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह हर बच्चे के लिए उपयुक्त है। इसी तरह, बच्चों की लंबाई या विकास को लेकर किए गए विज्ञापनों को भी बिना पर्याप्त जानकारी के निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
आगे क्या होगा?
नेस्ले इंडिया और जायडस वेलनेस को जारी नोटिस के बाद अब उनके जवाब और प्रस्तुत किए जाने वाले वैज्ञानिक प्रमाण महत्वपूर्ण होंगे। FSSAI इन दावों का मूल्यांकन कर सकता है और नियमानुसार आगे कदम उठा सकता है। हालांकि, दोनों कंपनियों के जवाब, नोटिस की पूरी शर्तों और नियामक के अंतिम निष्कर्षों की विस्तृत जानकारी सामने आने के बाद ही मामले की स्थिति स्पष्ट होगी।
कुल मिलाकर, यह मामला खाद्य एवं पोषण उत्पादों के विज्ञापनों में किए जाने वाले दावों की प्रमाणिकता के महत्व को सामने लाता है। उपभोक्ताओं के भरोसे को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उत्पादों के बारे में दी जाने वाली जानकारी स्पष्ट, सटीक और वैज्ञानिक आधार पर हो।
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