Business : अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 97 रुपये के स्तर तक कमजोर हुई भारतीय मुद्रा को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने सख्त कदम उठाए हैं। विदेशी मुद्रा कारोबार से जुड़े इन फैसलों का असर ऑफशोर बाजार में दिखाई दिया। दिए गए शुरुआती विवरण के अनुसार, एक महीने के नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड यानी एनडीएफ बाजार में रुपया एक समय 2.7 प्रतिशत तक मजबूत होकर 94.17 के स्तर पर पहुंचा। हालांकि, बाद में यह बढ़त घटकर करीब 0.7 प्रतिशत रह गई। यह घरेलू हाजिर बाजार का भाव नहीं था।
सोमवार को घरेलू बाजार खुलने के बाद भी रुपये में मजबूती दर्ज की गई। प्रकाशित कारोबारी रिपोर्ट के अनुसार, रुपया लगभग एक प्रतिशत मजबूत होकर 95.74 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचा। इसलिए बाजार खुलने पर तेजी आने की संभावना वाला शुरुआती अनुमान अब वास्तविक कारोबार की जानकारी से आगे बढ़ चुका है। ऑफशोर बाजार के 94.17 और घरेलू बाजार के 95.74 के आंकड़े अलग बाजारों तथा अलग समय की स्थिति बताते हैं। इन्हें एक ही विनिमय दर मानना सही नहीं होगा।
रुपये की कमजोरी रोकने के लिए उठाए गए कदमों में विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कारोबार से संबंधित नियमों को कड़ा करना शामिल है। प्रकाशित विवरण के अनुसार, रद्द किए गए रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों की दोबारा बुकिंग पर प्रतिबंध लगाया गया है। साथ ही, वास्तविक जोखिम का आधार स्थापित किए बिना होने वाले सौदों की सीमा घटाई गई है। इन बदलावों का उद्देश्य मुद्रा कारोबार में अनुशासन बढ़ाना और अत्यधिक सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखना बताया गया है।
कुछ निर्धारित विदेशी मुद्रा सुरक्षा अनुबंधों के लिए बैंकों पर नकद रिजर्व रखने की शर्त भी लागू की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, संबंधित सौदों पर 20 प्रतिशत नकद रिजर्व की व्यवस्था की गई है। ऐसी शर्त से बैंकों की राशि का एक हिस्सा रिजर्व में रहेगा, जिसका असर मुद्रा जोखिम से बचाव वाले सौदों की लागत पर पड़ सकता है। यह नियम हर सामान्य बैंक ग्राहक के खाते से 20 प्रतिशत राशि काटने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि निर्धारित विदेशी मुद्रा कारोबार से संबंधित है।
तेल विपणन कंपनियों की डॉलर जरूरत के लिए विशेष व्यवस्था की जानकारी भी सामने आई है। इसके तहत संबंधित कंपनियां रिजर्व बैंक से सीधे डॉलर खरीद सकती हैं। सामान्य विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग कम करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। कंपनियों की मुद्रा जरूरत और उनके जोखिम से बचाव वाले सौदे रुपये पर दबाव को प्रभावित करते हैं। नई व्यवस्था से बाजार में डॉलर की खरीद के तरीके में बदलाव आएगा, लेकिन इसका प्रभाव समय और कारोबारी परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है।
आम लोगों पर विनिमय दर का असर समझने के लिए इसका गणित देखना उपयोगी है। यदि एक डॉलर की कीमत 97 रुपये है, तो 100 डॉलर के भुगतान के लिए 9,700 रुपये चाहिए। वही दर 95 रुपये होने पर भुगतान 9,500 रुपये होगा। यह केवल उदाहरण है, किसी बैंक की वास्तविक ग्राहक दर नहीं। रुपये की मजबूती से डॉलर में तय भुगतान की रुपये में लागत घट सकती है। बैंक शुल्क, मुद्रा बदलने की दर और भुगतान के समय के कारण वास्तविक खर्च अलग रहेगा।
विदेश में पढ़ाई, यात्रा या डॉलर में भुगतान करने वाले लोगों के लिए रुपये का मजबूत होना इसी वजह से उपयोगी हो सकता है। हालांकि, एक दिन की तेजी से उनके सभी खर्च तुरंत कम नहीं हो जाते। खर्च उस समय की दर पर निर्भर करेगा, जब मुद्रा बदली या भुगतान किया जाएगा। दूसरी ओर, डॉलर में आय पाने वाले व्यक्ति को समान डॉलर राशि बदलने पर रुपये कम मिल सकते हैं। यह प्रभाव विनिमय दर का सामान्य गणित है और प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक स्थिति उसके लेनदेन पर निर्भर करेगी।
व्यापार के स्तर पर भी असर अलग-अलग हो सकता है। डॉलर में भुगतान करने वाले आयातक को मजबूत रुपये से मुद्रा संबंधी लागत में राहत मिल सकती है। वहीं, डॉलर में प्राप्त रकम को रुपये में बदलने वाले निर्यातक की प्राप्ति प्रभावित हो सकती है। लेकिन पहले से तय मुद्रा सुरक्षा अनुबंध होने पर असर अलग रहेगा। इसलिए मजबूत रुपये का लाभ या नुकसान सभी कारोबारों के लिए समान नहीं होता। वस्तु की कीमत, भुगतान की तारीख और अनुबंध की शर्तें भी महत्वपूर्ण रहती हैं।
नई व्यवस्था के संबंध में बैंकों ने बदलाव और स्पष्टता की मांग की है। रिपोर्ट के अनुसार, नकद रिजर्व की शर्त से उपलब्ध धन तथा मुद्रा जोखिम से बचाव की लागत पर असर पड़ने की चिंता जताई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि रुपये को सहारा देने वाले कदमों के साथ कारोबार की लागत का पहलू भी जुड़ा है। शुरुआती मजबूती के बावजूद घरेलू और ऑफशोर बाजारों की दरों को अलग समझना जरूरी है। आम लोगों पर वास्तविक असर उनके भुगतान, आय और मुद्रा बदलने के समय से तय होगा।